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Rigveda / 7 / 18 / 7

आ प॒क्थासो॑ भला॒नसो॑ भन॒न्तालि॑नासो विषा॒णिनः॑ शि॒वासः॑। आ योऽन॑यत्सध॒मा आर्य॑स्य ग॒व्या तृत्सु॑भ्यो अजगन्यु॒धा नॄन् ॥७॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 18 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : इन्द्र: | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर राजजन कैसे श्रेष्ठ हों, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : आ। प॒क्थासः॑। भ॒ला॒नसः॑। भ॒न॒न्त॒। आ। अलि॑नासः। वि॒षा॒णिनः॑। शि॒वासः॑। आ। यः। अन॑यत्। स॒ध॒ऽमाः। आर्य॑स्य। ग॒व्या। तृत्सु॑ऽभ्यः। अ॒ज॒ग॒न्। यु॒धा। नॄन् ॥७॥

पदार्थ : हे राजन् ! जो (पक्थासः) पाकविद्या में कुशल (भलानसः) सब ओर से कहने योग्य (अलिनासः) जिनकी सूभूषित नासिका (विषाणिनः) जिनके सींग के समान तीक्ष्ण नख विद्यमान (शिवासः) और जो मङ्गलकारी आपको (आ, भनन्त) अच्छे प्रकार उपदेश करें (तृत्सुभ्यः) हिंसकों से (युधा) युद्ध से (नॄन्) मनुष्यों को (आ, अजगन्) प्राप्त हों (यः) जो (सधमाः) समान स्थान में मानते हुए (आर्यस्य) उत्तम जन के (गव्या) उत्तम वाणी में प्रसिद्ध हुओं को (आ, अनयत्) अच्छे प्रकार पहुँचाता है, उन सब की आप उत्तमता से रक्षा करो ॥७॥

भावार्थ : हे राजन् ! जो तपस्वी पुरुषार्थी वक्ता जन उत्तम रूपवाले मङ्गल जिनके आचरण युद्ध विद्या में कुशल आर्यजन आपको जिस-जिस का उपदेश दें, उस-उस को अप्रमत्त होते हुए सदा ठानो अर्थात् सर्वदैव उसका आचरण करो ॥७॥