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Rigveda / 7 / 18 / 12

अध॑ श्रु॒तं क॒वषं॑ वृ॒द्धम॒प्स्वनु॑ द्रु॒ह्युं नि वृ॑ण॒ग्वज्र॑बाहुः। वृ॒णा॒ना अत्र॑ स॒ख्याय॑ स॒ख्यं त्वा॒यन्तो॒ ये अम॑द॒न्ननु॑ त्वा ॥१२॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 18 | Mantra No : 12

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : इन्द्र: | छन्द : भुरिक्पङ्क्तिः | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर राजा अमात्य और प्रजा पुरुष परस्पर कैसे वर्तें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : अध॑। श्रु॒तम्। क॒वष॑म्। वृ॒द्धम्। अ॒प्ऽसु। अनु॑। द्रु॒ह्युम्। नि। वृ॒ण॒क्। वज्र॑ऽबाहुः। वृ॒णा॒नाः। अत्र॑। स॒ख्याय॑। स॒ख्यम्। त्वा॒ऽयन्तः॑। ये। अम॑दन्। अनु॑। त्वा॒ ॥१२॥

पदार्थ : हे राजन् ! (ये) जो (अत्र) यहाँ (सख्याय) मित्रता के लिये (सख्यम्) मित्रपन को (वृणानाः) स्वीकार करते और (त्वायन्तः) तुम्हारी चाह करते हुए धार्मिक विद्वान् पुरुष (त्वा) तुमको (अनु, अमदन्) आनन्दित करते हैं (अध) इसके अनन्तर उनसे जिस कारण (श्रुतम्) सुना इस कारण उनमें से (कवषम्) उपदेश करनेवाले (वृद्धम्) अवस्था और विद्या से अधिक को और (द्रुह्युम्) दुष्टों से द्रोह करनेवाले को जो (वज्रबाहुः) शास्त्रों को हाथों में रखनेवाला (निवृणक्) निरन्तर विवेक से स्वीकार करता और (अप्सु) जलों में (अनु) अनुकूलता से स्वीकार करता है, उन सबको वा उसको सब सत्कार करें ॥१२॥

भावार्थ : हे राजा ! जो आपके अनुकूल वर्त्तमान हैं, जिनके अनुकूल आप हैं, वे सब मित्र मित्र होकर न्याय से पुत्र के समान पालन कर आनन्द भोगें ॥१२॥