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Rigveda / 7 / 19 / 1

यस्ति॒ग्मशृ॑ङ्गो वृष॒भो न भी॒म एकः॑ कृ॒ष्टीश्च्या॒वय॑ति॒ प्र विश्वाः॑। यः शश्व॑तो॒ अदा॑शुषो॒ गय॑स्य प्रय॒न्तासि॒ सुष्वि॑तराय॒ वेदः॑ ॥१॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 19 | Mantra No : 1

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : इन्द्र: | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अब ग्यारह ऋचावाले उन्नीसवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में कैसा राजा उत्तम राजा होता है, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : यः। ति॒ग्मऽशृ॑ङ्गः। वृ॒ष॒भः। न। भी॒मः। एकः॑। कृ॒ष्टीः। च्य॒वय॑ति। प्र। विश्वाः॑। यः। शश्व॑तः। अदा॑शुषः। गय॑स्य। प्र॒ऽय॒न्ता। अ॒सि॒। सु॒स्वि॑ऽतराय। वेदः॑ ॥१॥

पदार्थ : हे राजन् ! (यः) जो कल्याण जन (तिग्मशङ्गः) तीक्ष्ण किरणों से युक्त (वृषभः) वर्षा (भीमः) भय करनेवाले सूर्य के (न) समान (एकः) अकेला (विश्वाः) समग्र प्रजा (कृष्टीः) मनुष्यों को (प्र, च्यावयति) अच्छे प्रकार चलाता है और (यः) जो (शश्वतः) निरन्तर (अदाशुषः) न देनेवाले के (गयस्य) सन्तान के (सुष्वितराय) सुन्दर अतीव ऐश्वर्यको निकालनेवाले के लिये (वेदः) विज्ञान वा धन को करता है, उसके जिससे तुम (प्रयन्ता) उत्तमता से नियम करनेवाले (असि) हो, इससे अधिक मानने योग्य हो ॥१॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । हे मनुष्यो ! जैसे सूर्य वा बिजुली वर्षा करने से सुख देनेवाली और तीव्र ताप से वा पड़ जाने से भयंकर है, वैसे जो राजा विद्याध्ययन के लिये सन्तानों को नहीं देते उनके लिये दण्ड देनेवाला वा ब्रह्मचर्य्य से सब की विद्या बढ़ानेवाला राजा हो, उसी को सब स्वीकार करें ॥१॥