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Rigveda / 7 / 19 / 6

सना॒ ता त॑ इन्द्र॒ भोज॑नानि रा॒तह॑व्याय दा॒शुषे॑ सु॒दासे॑। वृष्णे॑ ते॒ हरी॒ वृष॑णा युनज्मि॒ व्यन्तु॒ ब्रह्मा॑णि पुरुशाक॒ वाज॑म् ॥६॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 19 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर वह राजा क्या करे, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : सना॑। ता। ते॒। इ॒न्द्र॒। भोज॑नानि। रा॒तऽह॑व्याय। दा॒शुषे॑। सु॒ऽदासे॑। वृष्णे॑। ते॒। हरी॒ इति॑। वृष॑णा। यु॒न॒ज्मि॒। व्यन्तु॑। ब्रह्मा॑णि। पु॒रु॒ऽशा॒क॒। वाज॑म् ॥६॥

पदार्थ : हे (पुरुशाक) बहुत शक्तियुक्त (इन्द्र) परम ऐश्वर्य के देनेवाले राजा ! जो (ते) आपके (रातहव्याय) दी है देने योग्य वस्तु जिसने उस (सुदासे) सुन्दर दानशील (वृष्णे) सुखवृष्टि करने (दाशुषे) देनेवाले के लिये (सना) सनातन वा विभाग करने योग्य (भोजनानि) भोजन है (ता) उनको मैं (युनज्मि) संयुक्त करता हूँ तथा जो (ते) आपके (वृषणा) बलयुक्त अश्व (हरी) हरणशील हैं उनको संयुक्त करता हूँ जिससे प्रजाजन (वाजम्) वेग और (ब्रह्माणि) धनों को (व्यन्तु) प्राप्त हों ॥६॥

भावार्थ : हे राजजनो ! यदि आप लोग कर देनेवालों की पालना न्याय से करें और शरीर से धन से और मन से प्रजाजनों की उन्नति करें तो कुछ भी ऐश्वर्य अलभ्य न हो ॥६॥