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Rigveda / 1 / 45 / 2

श्रु॒ष्टी॒वानो॒ हि दा॒शुषे॑ दे॒वा अ॑ग्ने॒ विचे॑तसः । तान्रो॑हिदश्व गिर्वण॒स्त्रय॑स्त्रिंशत॒मा व॑ह ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 45 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : प्रस्कण्वः काण्वः | देवता : अग्निर्देवाः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : फिर वह क्या करे, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदपाठ : श्रु॒ष्टी॒ऽवानः । हि । दा॒शुषे॑ । दे॒वाः । अ॒ग्ने॒ । विचे॑तसः । तान् । रो॒हि॒त्ऽअ॒श्व॒ । गि॒र्व॒णः॒ । त्रयः॑ऽत्रिंशतम् । आ । व॒ह॒॥ऽ

पदार्थ : हे (रोहिदश्व) वेग आदि गुणयुक्त (गिर्वणः) वाणियों से सेवित (अग्ने) विद्वन् ! (त्वम्) आप इस संसार में जो (विचेतसः) नाना प्रकार के शास्त्रोक्त ज्ञानयुक्त (श्रुष्टीवानः) यथार्थ विद्या के सेवन करनेवाले (देवाः) दिव्य गुणवान् विद्वान् (दाशुषे) दानशील पुरुषार्थी मनुष्य के लिये सुख देते हैं (तान्) उन (त्रयस्त्रिंशतम्) भूमि आदि तैंतीस दिव्य गुण वालों को (हि) निश्चय करके (आवह) प्राप्त हूजिये ॥२॥

भावार्थ : जब विद्वान् लोग विद्यार्थियों को तैंतीस देव अर्थात् पृथिवी आदि तैंतीस पदार्थों की विद्या को अच्छे प्रकार साक्षात्कार कराते हैं तब वे बिजुली आदि अनेक पदार्थों से उत्तम-२ व्यवहारों की सिद्धि कर सकते हैं ॥२॥