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Rigveda / 7 / 21 / 9

सखा॑यस्त इन्द्र वि॒श्वह॑ स्याम नमोवृ॒धासो॑ महि॒ना त॑रुत्र। व॒न्वन्तु॑ स्मा॒ तेऽव॑सा समी॒के॒३॒॑भी॑तिम॒र्यो व॒नुषां॒ शवां॑सि ॥९॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 21 | Mantra No : 9

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : इन्द्र: | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर किसकी मित्रता करनी चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : सखा॑यः। ते॒। इ॒न्द्र॒। वि॒श्वह॑। स्या॒म॒। न॒मः॒ऽवृ॒धासः॑। म॒हि॒ना। त॒रु॒त्र॒। व॒न्वन्तु॑। स्म॒। ते॒। अव॑सा। स॒मी॒के। अ॒भिऽइ॑तिम्। अ॒र्यः। व॒नुषा॑म्। शवां॑सि ॥९॥

पदार्थ : हे (तरुत्र) दुःख से तारनेवाले (इन्द्र) राजा ! (नमोवृधासः) अन्न के बढ़ाने वा अन्न से बढ़े हुए हम लोग (महिना) बड़प्पन से (विश्वह) सब दिनों (ते) आपके (सखायः) मित्र (स्याम) हों जो (ते) आपके (समीके) समीप में (अवसा) रक्षा आदि से (अभीतिम्) अभय और (वनुषाम्) मंगता जनों के (शवांसि) बलों को (वन्वन्तु, स्म) ही मांगे (अर्यः) वैश्यजन आप इनके इस पदार्थ को धारण करो ॥९॥

भावार्थ : जो धार्मिक राजा से नित्य मित्रता करने की इच्छा करते हैं, वे बड़प्पन से सत्कार पाते हैं, जो प्रजा को अभय देते हैं, वे प्रतिदिन बलिष्ठ होते हैं ॥९॥