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Rigveda / 7 / 22 / 7

तुभ्येदि॒मा सव॑ना शूर॒ विश्वा॒ तुभ्यं॒ ब्रह्मा॑णि॒ वर्ध॑ना कृणोमि। त्वं नृभि॒र्हव्यो॑ वि॒श्वधा॑सि ॥७॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 22 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृदनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : फिर सेनापतियों को क्या करना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : तुभ्य॑। इत्। इ॒मा। सव॑ना। शू॒र॒। विश्वा॑। तुभ्य॑म्। ब्रह्मा॑णि। वर्ध॑ना। कृ॒णो॒मि॒। त्वम्। नृऽभिः॑। हव्यः॑। वि॒श्वधा॑। अ॒सि॒ ॥७॥

पदार्थ : हे (शूर) निर्भयता से शत्रुजनों की हिंसा करनेवाले राजा वा सेनापति ! जो (विश्वधा) विश्व को धारण करनेवाले (त्वम्) आप (नृभिः) नायक मनुष्यों से (हव्यः) स्तुति वा ग्रहण करने योग्य (असि) हैं इससे (तुभ्य) तुम्हारे लिये (इत्) ही (इमा) यह (सवना) ओषधियों के बनाने वा प्रेरणाओं को (कृणोमि) करता हूँ और (तुभ्यम्) तुम्हारे लिये (विश्वा) समस्त (ब्रह्माणि) धन वा अन्नों और (वर्धना) उन्नति करनेवाले कर्मों को करता हूँ ॥७॥

भावार्थ : सेनाधिष्ठाता जन सेनास्थ योद्धा भृत्यजनों की अच्छे प्रकार परीक्षा कर अधिकार और कार्य्यों में नियुक्त करें, यथावत् उनकी पालना करके उत्तम शिक्षा से बढ़ावें ॥७॥