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Rigveda / 7 / 31 / 12

इन्द्रं॒ वाणी॒रनु॑त्तमन्युमे॒व स॒त्रा राजा॑नं दधिरे॒ सह॑ध्यै। हर्य॑श्वाय बर्हया॒ समा॒पीन् ॥१२॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 31 | Mantra No : 12

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : इन्द्र: | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : फिर कैसे मनुष्य को सत्य वाणी सेवती है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : इन्द्र॑म्। वाणीः॑। अनु॑त्तऽमन्युम्। ए॒व। स॒त्रा। राजा॑नम्। द॒धि॒रे॒। सह॑ध्यै। हरि॑ऽअश्वाय। ब॒र्ह॒य॒। सम्। आ॒पीन् ॥१२॥

पदार्थ : हे विद्वान् ! जो (वाणीः) सकल विद्यायुक्त वाणी (सत्रा) सत्य से (अनुत्तमन्युम्) जिसका प्रेरणा नहीं किया गया क्रोध उस (राजानम्) प्रकाशमान (इन्द्रम्) अविद्या विदीर्ण करनेवाले विद्वान् को (सहध्यै) सहने को (दधिरे) धारण करते तथा (आपीन्) जो व्याप्त होते हैं उनको (सम्) अच्छे प्रकार धारण करते हैं (एव) उसी (हर्यश्वाय) प्रशंसित मनुष्य और घोड़ोंवाले के लिये सब विद्याओं को (बर्हय) बढ़ाओ ॥१२॥

भावार्थ : जिस न उत्पन्न हुए क्रोधवाले, जितेन्द्रिय राजा को सकल शास्त्रयुक्त वाणी व्याप्त होती है, वही सत्य न्याय से प्रजा पालने योग्य होता है ॥१२॥ इस सूक्त में इन्द्र, विद्वान् और राजा के काम का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ॥ यह इकतीसवाँ सूक्त और सोलहवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥