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Rigveda / 7 / 34 / 7

उद॑स्य॒ शुष्मा॑द्भा॒नुर्नार्त॒ बिभ॑र्ति भा॒रं पृ॑थि॒वी न भूम॑ ॥७॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 34 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : निचृत्त्रिपाद्गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : फिर वे कन्या विद्या कैसे पावें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : उत्। अ॒स्य॒। शुष्मा॑त्। भा॒नुः। न। आ॒र्त॒। बिभ॑र्ति। भा॒रम्। पृ॒थि॒वी। न। भूम॑ ॥७॥

पदार्थ : हे कन्याजनो ! जैसे हम (भारम्) भार को (पृथिवी) भूमि (न) जैसे और (भानुः) किरणयुक्त सूर्य जैसे (न) वैसे (अस्य) इस विद्याव्यवहार के (शुष्मात्) बल से विदुषी (भूम) हों वा जैसे यह भानु पृथिवी आदि के भार को (उद्, बिभर्ति) उत्कृष्टता से धारण करता है, समस्त उस व्यवहार को (आर्त्त) प्राप्त होता है, वैसे तुम होओ ॥७॥

भावार्थ : जैसे विद्वान् जन इस विद्याबोध के बल से सब सुख को धारण करते हैं, वैसे ही कन्याजन विद्याबल से सब आनन्द को पाती हैं ॥७॥