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Rigveda / 7 / 34 / 15

स॒जूर्दे॒वेभि॑र॒पां नपा॑तं॒ सखा॑यं कृध्वं शि॒वो नो॑ अस्तु ॥१५॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 34 | Mantra No : 15

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : निचृत्त्रिपाद्गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : फिर वे राजजन क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : स॒ऽजूः। दे॒वेभिः॑। अ॒पाम्। नपा॑तम्। सखा॑यम्। कृ॒ध्व॒म्। शि॒वः। नः॒। अ॒स्तु॒ ॥१५॥

पदार्थ : हे राजन् ! जैसे (देवेभिः) विद्वानों से वा पृथिवी आदि दिव्य पदार्थों के (सजूः) साथ वर्त्तमान सूर्यमण्डल (अपां नपातम्) जलों के उस व्यवहार को जो नहीं नष्ट होता मेघ के समान करता है, वैसे आप (नः) हमारे वा हमारे लिये (शिवः) मङ्गलकारी (अस्तु) हों, हे विद्वानो ! ऐसे राजा को हमारा (सखायम्) मित्र (कृध्वम्) कीजिये ॥१५॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । हे मनुष्यो ! जैसे सूर्य आदि पदार्थ जगत् में मित्र के समान वर्त कर सुखकारी होते हैं, वैसे ही राजजन सब के मित्र होकर मङ्गलकारी होते हैं ॥१५॥