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Rigveda / 1 / 46 / 5

आ॒दा॒रो वां॑ मती॒नां नास॑त्या मतवचसा । पा॒तं सोम॑स्य धृष्णु॒या ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 46 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : प्रस्कण्वः काण्वः | देवता : अश्विनौ | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : फिर वे कैसे हैं, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदपाठ : आ॒दा॒रः । वा॒म् । म॒ती॒नाम् । नास॑त्या । म॒त॒ऽव॒च॒सा॒ । पा॒तम् । सोम॑स्य । धृ॒ष्णु॒ऽया॥

पदार्थ : हे (नासत्या) पवित्र गुण स्वभाव युक्त (मतवचसा) ज्ञान से बोलने वाले सभा सेना के पति ! तुम जो (वाम्) तुम्हारे (आदारः) सब प्रकार से शत्रुओं को विदारण कर्त्ता गुण हैं उस और (धृष्णुया) प्रगल्भता से (सोमस्य) ऐश्वर्य्य और (मतीनाम्) मनुष्यों की (पातम्) रक्षा करो ॥५॥

भावार्थ : राजपुरुषों को चाहिये कि दृढ़ बल युक्त सेना से शत्रुओं को जीत अपनी प्रजा के ऐश्वर्य्य की निरन्तर वृद्धि किया करें ॥५॥