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Rigveda / 7 / 36 / 7

उ॒त त्ये नो॑ म॒रुतो॑ मन्दसा॒ना धियं॑ तो॒कं च॑ वा॒जिनो॑ऽवन्तु। मा नः॒ परि॑ ख्य॒दक्ष॑रा॒ चर॒न्त्यवी॑वृध॒न्युज्यं॒ ते र॒यिं नः॑ ॥७॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 36 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : भुरिक्पङ्क्तिः | स्वर : पञ्चमः

विषय : कौन विद्वान् जन श्रेष्ठ होते हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : उ॒त। त्ये। नः॒। म॒रुतः॑। म॒न्द॒सा॒नाः। धिय॑म्। तो॒कम्। च॒। वा॒जिनः॑। अ॒व॒न्तु॒। मा। नः॒। परि॑। ख्य॒त्। अक्ष॑रा। चर॑न्ती। अवी॑वृधन्। युज्य॑म्। ते। र॒यिम्। नः॒ ॥७॥

पदार्थ : (त्ये) वे (वाजिनः) प्रशंसित विज्ञानवाले (मन्दसानाः) कामना करते हुए (मरुतः) विद्वान् जन (नः) हमारी (धियम्) बुद्धि को (उत) और (तोकम्) सन्तान को (च) भी (अवन्तु) बढ़ावें जैसे (चरन्ती) प्राप्त होती हुई (अक्षरा) अविनाशिनी वाणी (नः) हम लोगों को (मा) मत (परि, ख्यत्) सब ओर से वर्जे, वैसे (नः) हम लोगों के सम्बन्ध में (ते) आप के (युज्यम्) योग्य (रयिम्) धन को (अवीवृधन्) बढ़ावें ॥७॥

भावार्थ : वे ही विद्वान् जन अति उत्तम हैं, जो सब के पुत्र और कन्याओं को ब्रह्मचर्य्य से रक्षा कर और बढ़ा कर उत्तम ज्ञाता करते हैं ॥७॥