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Rigveda / 7 / 36 / 9

अच्छा॒यं वो॑ मरुतः॒ श्लोक॑ ए॒त्वच्छा॒ विष्णुं॑ निषिक्त॒पामवो॑भिः। उ॒त प्र॒जायै॑ गृण॒ते वयो॑ धुर्यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः ॥९॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 36 | Mantra No : 9

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : कौन विद्वान् सेवा करने योग्य हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : अच्छ॑। अ॒यम्। वः॒। म॒रु॒तः॒। श्लोकः॑। ए॒तु॒। अच्छ॑। विष्णु॑म्। नि॒सि॒क्त॒ऽपाम्। अवः॑ऽभिः। उ॒त। प्र॒ऽजायै॑। गृ॒ण॒ते। वयः॑। धुः॒। यू॒यम्। पा॒त॒। स्व॒स्तिऽभिः॑। सदा॑। नः॒ ॥९॥

पदार्थ : हे (मरुतः) विद्वान् मनुष्यो ! जैसे (अयम्) यह (वः) तुम्हारी (श्लोकः) शिक्षायुक्त वाणी (अवोभिः) रक्षाओं के साथ (निषिक्तपाम्) जो धर्म के बीच अभिषेक पाये हुए [हैं उन के रक्षक] (विष्णुम्) व्यापक परमेश्वर को (अच्छ, एतु) अच्छे प्रकार प्राप्त हो (उत) और जो (गृणते) स्तुति करनेवाली (प्रजायै) प्रजा के लिये (वयः) जीवन को (अच्छा) अच्छे प्रकार (धुः) धारण करते हैं जैसे (यूयम्) तुम (स्वस्तिभिः) सुखों के साथ (नः) हम लोगों की (सदा) सर्वदैव (पात) रक्षा करो, [वैसे हम तुम्हारी रक्षा करें] ॥९॥

भावार्थ : जानने की इच्छावालों को वेदवेत्ता ब्रह्म के जाननेवाले अध्यापक और उपदेशकों को प्राप्त होकर परमेश्वर आदि की विद्याओं का संग्रह कर सर्वदैव सब प्रकार से सब की रक्षा और उन्नति बढ़ानी चाहिये ॥९॥ इस सूक्त में विश्वेदेवों के कर्म और गुणों का गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की सङ्गति इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ जाननी चाहिये ॥ यह छत्तीसवाँ सूक्त और दूसरा वर्ग समाप्त हुआ ॥