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Rigveda / 7 / 37 / 4

त्वमि॑न्द्र॒ स्वय॑शा ऋभु॒क्षा वाजो॒ न सा॒धुरस्त॑मे॒ष्यृक्वा॑। व॒यं नु ते॑ दा॒श्वांसः॑ स्याम॒ ब्रह्म॑ कृ॒ण्वन्तो॑ हरिवो॒ वसि॑ष्ठाः ॥४॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 37 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : निचृत्पङ्क्तिः | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर मनुष्य कैसे हों, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : त्वम्। इ॒न्द्र॒। स्वऽय॑शाः। ऋ॒भु॒क्षाः। वाजः॑। न। सा॒धुः। अस्त॑म्। ए॒षि॒। ऋक्वा॑। व॒यम्। नु। ते॒। दा॒श्वांसः॑। स्या॒म॒। ब्रह्म॑। कृ॒ण्वन्तः॑। ह॒रि॒ऽवः॒। वसि॑ष्ठाः ॥४॥

पदार्थ : हे (हरिवः) प्रशंसित मनुष्यों (इन्द्र) और योगैश्वर्यों से युक्त जन ! जो (ऋभुक्षाः) मेधावी (स्वयशाः) अपनी कीर्ति से युक्त (ऋक्वाः) सत्कार करनेवाले (वाजः) ज्ञानवान् के (न) समान (साधुः) सत्कर्म सेवने हारे (त्वम्) आप (अस्तम्) घर को (एषि) प्राप्त होते हैं उन (ते) आप के (ब्रह्म) धन वा अन्न को (नु) शीघ्र (कृण्वन्तः) सिद्ध करते हुए (वसिष्ठाः) अतीव अच्छे गुण कर्मों के बीच निवास करनेवाले (वयम्) हम लोग (दाश्वांसः) दानशील (स्याम) हों ॥४॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । जो अच्छे मार्ग में स्थिर, साधु जनों के समान धर्मों का आचरण करते हैं, वे ऐश्वर्य के साथ हो अर्थात् ऐश्वर्य्यवान् होकर दानशील होते हैं ॥४॥