Rigveda / 7 / 37 / 6
वा॒सय॑सीव वे॒धस॒स्त्वं नः॑ क॒दा न॑ इन्द्र॒ वच॑सो बुबोधः। अस्तं॑ ता॒त्या धि॒या र॒यिं सु॒वीरं॑ पृ॒क्षो नो॒ अर्वा॒ न्यु॑हीत वा॒जी ॥६॥
Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 37 | Mantra No : 6
In English:
Seer : vasiShThaH | Devta : vishvedevaa: | Metre : svaraaTpa~NktiH | Tone : pa~nchamaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : vaasayasiiva vedhasastva.m naH kadaa na indra vachaso bubodhaH. asta.m taatyaa dhiyaa rayi.m suviira.m pRRikSho no arvaa nyuhiita vaajii .6.
Component Words : vaasayasi.aiva. vedhasaH. tvam. naH. kadaa. naH. indra. vachasaH. bubodhaH. astam. taatyaa. dhiyaa. rayim. su.aviiram. pRRikShaH. naH. arvaa. ni. uhiita. vaajii .6.
In Hindi:
ऋषि : वसिष्ठः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : स्वराट्पङ्क्तिः | स्वर : पञ्चमः
विषय : फिर विद्वानों को क्या करना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥
पदपाठ : वा॒सय॑सिऽइव। वे॒धसः॑। त्वम्। नः॒। क॒दा। नः॒। इ॒न्द्र॒। वच॑सः। बु॒बो॒धः॒। अस्त॑म्। ता॒त्या। धि॒या। र॒यिम्। सु॒ऽवीर॑म्। पृ॒क्षः। नः॒। अर्वा॑। नि। उ॒ही॒त॒। वा॒जी ॥६॥
पदार्थ : हे (इन्द्र) सुख देनेवाले ! (त्वम्) आप (तात्या) व्याप्त परमेश्वर में उत्तमता से स्थिर होनेवाली (धिया) बुद्धि से (नः) हम (वेधसः) बुद्धिमान् जनों को (वासयसीव) वसाते हुए से (नः) हमारे (वचसः) वचन को (कदा) कब (बुबोधः) जानोगे (वाजी) विज्ञानवान् आप (अर्वा) घोड़े के समान (नः) हम लोगों को (सुवीरम्) जिससे अच्छे-अच्छे वीर जन होते हैं उस (रयिम्) धन को कब (नि, उहीत) प्राप्त करियेगा और हमारे (अस्तम्) घर को प्राप्त होकर (पृक्षः) सम्पर्क करने योग्य अन्न कब सेवोगे ॥६॥
भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । सब मनुष्य विद्वानों के प्रति ऐसी प्रार्थना करें, आप लोग हमें कब विद्वान् करके धन-धान्य, स्थान आदि पदार्थ और ऐश्वर्य्य को प्राप्त करावेंगे ॥६॥
In Sanskrit:
ऋषि : वसिष्ठः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : स्वराट्पङ्क्तिः | स्वर : पञ्चमः
विषय : पुनर्विद्वद्भिः किं कर्तव्यमित्याह ॥
पदपाठ : वा॒सय॑सिऽइव। वे॒धसः॑। त्वम्। नः॒। क॒दा। नः॒। इ॒न्द्र॒। वच॑सः। बु॒बो॒धः॒। अस्त॑म्। ता॒त्या। धि॒या। र॒यिम्। सु॒ऽवीर॑म्। पृ॒क्षः। नः॒। अर्वा॑। नि। उ॒ही॒त॒। वा॒जी ॥६॥
पदार्थ : (वासयसीव) (वेधसः) मेधाविनः (त्वम्) (नः) अस्मान् (कदा) (नः) अस्माकम् (इन्द्र) सुखप्रद (वचसः) वचनस्य (बुबोधः) बुद्ध्याः (अस्तम्) गृहम् (तात्या) या तते परमेश्वरे साध्वी तया (धिया) प्रज्ञया (रयिम्) धनम् (सुवीरम्) शोभना वीरा यस्मात्तम् (पृक्षः) सम्पर्चनीयमन्नम् (नः) अस्मान् (अर्वा) अश्व इव (नि) (उहीत) वहेत् (वाजी) विज्ञानवान् ॥६॥
अन्वय : हे इन्द्र ! त्वं तात्या धिया नोऽस्मान् वेधसो वासयसीव नोऽस्माकं वचसः कदा बुबोधः वाज्यर्वा स नु नोऽस्मान् सुवीरं रयिं कदा न्युहीतास्माकमस्तं प्राप्य पृक्षः कदा सेवयेः ॥६॥
भावार्थ : अत्रोपमालङ्कारः । सर्वे मनुष्या विदुषः प्रत्येवं प्रार्थयेयुर्भवन्तोऽस्मान् कदा विदुषः कृत्वा धनधान्यस्थानाद्यैश्वर्यं प्रापयिष्यन्तीति ॥६॥