Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 7 / 45 / 4

इ॒मा गिरः॑ सवि॒तारं॑ सुजि॒ह्वं पू॒र्णग॑भस्तिमीळते सुपा॒णिम्। चि॒त्रं वयो॑ बृ॒हद॒स्मे द॑धातु यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः ॥४॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 45 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : सविता | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर धार्मिक विद्वान् जन किनसे स्तुति किये जावें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : इ॒माः। गिरः॑। स॒वि॒तार॑म्। सु॒ऽजि॒ह्वम्। पू॒र्णऽग॑भस्तिम्। ई॒ळ॒ते॒। सु॒ऽपा॒णिम्। चि॒त्रम्। वयः॑। बृ॒हत्। अ॒स्मे इति॑। द॒धा॒तु॒। यू॒यम्। पा॒त॒। स्व॒स्तिऽभिः॑। सदा॑। नः॒ ॥४॥

पदार्थ : जो (अस्मे) हम लोगों में (बृहत्) बहुत (चित्रम्) अद्भुत (वयः) आयु को (दधातु) धारण करे उस (सुपाणिम्) सुन्दर हाथोंवाले (पूर्णगभस्तिम्) पूर्ण रश्मि जिसकी उस सूर्यमण्डल के समान वर्त्तमान (सवितारम्) ऐश्वर्ययुक्त (सुजिह्वम्) सुन्दर जीभ रखते हुए धार्मिक मनुष्य की (इमाः) यह (गिरः) विद्या शिक्षा और धर्मयुक्त वाणी (ईळते) प्रशंसा करती हैं, हे विद्वानो ! (यूयम्) तुम विद्यायुक्त वाणी के समान (स्वस्तिभिः) सुखों से (नः) हम लोगों की (सदा) सर्वदैव (पात) रक्षा करो ॥४॥

भावार्थ : अच्छी विद्या से धार्मिक पुरुष होते हैं, धर्मात्मा पुरुष ही को विद्या और सर्व सुख प्राप्त होते हैं ॥४॥ इस सूक्त में सविता के तुल्य विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह पैंतालीसवाँ सूक्त और बारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥