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Rigveda / 7 / 47 / 4

याः सूर्यो॑ र॒श्मिभि॑रात॒तान॒ याभ्य॒ इन्द्रो॒ अर॑दद्गा॒तुमू॒र्मिम्। ते सि॑न्धवो॒ वरि॑वो धातना नो यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः ॥४॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 47 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : आपः | छन्द : स्वराट्पङ्क्तिः | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर स्त्री-पुरुष क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : याः। सूर्यः॑। र॒श्मिऽभिः॑। आ॒ऽत॒तान॑। याभ्यः॑। इन्द्रः॑। अर॑दत्। गा॒तुम्। ऊ॒र्मिम्। ते। सि॒न्ध॒वः॒। वरि॑वः। धा॒त॒न॒। नः॒। यू॒यम्। पा॒त॒। स्व॒स्तिऽभिः॑। सदा॑। नः॒ ॥४॥

पदार्थ : हे पुरुषो ! (सूर्यः) सूर्यमण्डल (रश्मिभिः) अपनी किरणों से (याः) जिन जलों को (आ, ततान) विस्तारता है (इन्द्रः) बिजुली (याभ्यः) जिन जलों से (गातुम्) भूमि को और (ऊर्मिम्) तरङ्ग को (अरदत्) छिन्न-भिन्न करती है, उनको अनुहारि स्त्री-पुरुष वर्तें जैसे (ते) वे (सिन्धवः) नदियाँ समुद्र को पूरा करती हैं, वैसे जो स्त्रियाँ सुखों से हम लोगों को (धातन) धारण करें (नः) हमारी (वरिवः) सेवा करें, उनकी हम भी सेवा करें, हे पतिव्रता स्त्रियो ! (यूयम्) तुम (स्वस्तिभिः) सुखों से (नः) हम पति लोगों की (सदा) सदा (पात) रक्षा करो ॥४॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । हे विद्वानो ! जैसे सूर्य अपने तेजों से भूमि के जलों को खींच कर विस्तार करता है, वैसे अच्छे कामों से प्रजा को तुम विस्तारो ॥४॥ इस सूक्त में विद्वान्,स्त्री-पुरुष के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह सैंतालीसवाँ सूक्त और चौदहवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥