Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 7 / 51 / 2

आ॒दि॒त्यासो॒ अदि॑तिर्मादयन्तां मि॒त्रो अ॑र्य॒मा वरु॑णो॒ रजि॑ष्ठाः। अ॒स्माकं॑ सन्तु॒ भुव॑नस्य गो॒पाः पिब॑न्तु॒ सोम॒मव॑से नो अ॒द्य ॥२॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 51 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : आदित्याः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर विद्वान् जन क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : आ॒दि॒त्यासः॑। अदि॑तिः। मा॒द॒य॒न्ता॒म्। मि॒त्रः। अ॒र्य॒मा। वरु॑णः। रजि॑ष्ठाः। अ॒स्माक॑म्। स॒न्तु॒। भुव॑नस्य। गो॒पाः। पिब॑न्तु। सोम॑म्। अव॑से। नः॒। अ॒द्य ॥२॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! जैसे (रजिष्ठाः) अतीव प्रीति करते हुए (अदितिः) अखण्डित नीति (मित्रः) मित्र (अर्यमा) व्यवस्था देनेवाला (वरुणः) श्रेष्ठ (अस्माकम्) हमारे (भुवनस्य) जल आदि लोकसमूह की (गोपाः) रक्षा करनेवाले हैं (नः) हमारी (अवसे) रक्षा आदि के लिये (मादयन्ताम्) आनन्द देते हैं (अद्य) आज (सोमम्) बड़ी-बड़ी ओषधियों के रस को (पिबन्तु) पीवें, वैसे वे (आदित्यासः) पूर्ण विद्वान् वा संवत्सर के महीने हमारे जलादि वा लोक-समूह की रक्षा करनेवाले (सन्तु) हों ॥२॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । हे विद्वानो ! तुम आदित्य के समान विद्या प्रकाश से, वैद्य के समान ओषधियों के सेवने से नीरोग होकर हमारा भी आरोग्य करो ॥२॥