Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 7 / 55 / 5

सस्तु॑ मा॒ता सस्तु॑ पि॒ता सस्तु॒ श्वा सस्तु॑ वि॒श्पतिः॑। स॒सन्तु॒ सर्वे॑ ज्ञा॒तयः॒ सस्त्व॒यम॒भितो॒ जनः॑ ॥५॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 55 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : इन्द्र: | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : फिर गृहस्थ घर में क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : सस्तु॑। मा॒ता। सस्तु॑। पि॒ता। सस्तु॑। श्वा। सस्तु॑। वि॒श्पतिः॑। स॒सन्तु॑। सर्वे॑। ज्ञा॒तयः॑। सस्तु॑। अ॒यम्। अ॒भितः॑। जनः॑ ॥५॥

पदार्थ : जो मनुष्य जैसे मेरे घर में मेरी (माता) माता (अभितः) सब ओर से (सस्तु) सोवे (पिता) पिता (सस्तु) सोवे (श्वा) कुत्ता (सस्तु) सोवे (विश्पतिः) प्रजापति (सस्तु) सोवे (सर्वे) सब (ज्ञातयः) सम्बन्धी सब ओर से (ससन्तु) सोवें (अयम्) यह (जनः) उत्तम विद्वान् सोवे, वैसे तुम्हारे घर में भी सोवें ॥५॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । मनुष्यों को ऐसे घर रचने चाहियें, जिनमें सब के सर्व व्यवहारों के करने को अलग-अलग शाला और घर होवें ॥५॥