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Rigveda / 7 / 55 / 7

स॒हस्र॑शृङ्गो वृष॒भो यः स॑मु॒द्रादु॒दाच॑रत्। तेना॑ सह॒स्ये॑ना व॒यं नि जना॑न्त्स्वापयामसि ॥७॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 55 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : इन्द्र: | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : फिर कैसे घर में सोना आदि करना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : स॒हस्र॑ऽशृङ्गः। वृ॒ष॒भः। यः। स॒मु॒द्रात्। उ॒त्ऽआच॑रत्। तेन॑। स॒ह॒स्ये॑न। व॒यम्। नि। जना॑न्। स्वा॒प॒या॒म॒सि॒ ॥७॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! (यः) जो (सहस्रशृङ्गः) हजारों किरणवाला (वृषभः) वृष्टि कारण सूर्य (समुद्रात्) अन्तरिक्ष से जैसे (उदाचरत्) ऊपर जाता है, वैसे (तेन) उस के साथ (सहस्येन) बल में उत्तम घर से (वयम्) हम लोग (जनान्) मनुष्यों को (नि, स्वापयामसि) निरन्तर सुलावें ॥७॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! जहाँ सूर्य की किरणों का स्पर्श सब ओर से हो और जो बल का अधिक बढ़ानेवाला घर हो, उसके शुद्ध होने में सब को सुलावें और हम लोग भी सोवें ॥७॥