Rigveda / 1 / 47 / 3
अश्वि॑ना॒ मधु॑मत्तमं पा॒तं सोम॑मृतावृधा । अथा॒द्य द॑स्रा॒ वसु॒ बिभ्र॑ता॒ रथे॑ दा॒श्वांस॒मुप॑ गच्छतम् ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 47 | Mantra No : 3
In English:
Seer : praskaNvaH kaaNvaH | Devta : ashvinau | Metre : pathyaavRRihatii | Tone : madhyamaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : ashvinaa madhumattama.m paata.m somamRRitaavRRidhaa . athaadya dasraa vasu bibhrataa rathe daashvaa.msamupa gachChatam .
Component Words : ashvinaa . madhumat.atamam . paatam . somam . RRIta.avRRidhaa . atha . adya . dasraa . vasu . bibhrataa . rathe . daasvaa.msam . upa . gachChatam.
In Hindi:
ऋषि : प्रस्कण्वः काण्वः | देवता : अश्विनौ | छन्द : पथ्यावृहती | स्वर : मध्यमः
विषय : फिर वे कैसे हैं इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।
पदपाठ : अश्वि॑ना । मधु॑मत्ऽतमम् । पा॒तम् । सोम॑म् । ऋ॒त॒ऽवृ॒धा॒ । अथ॑ । अ॒द्य । द॒स्रा॒ । वसु॑ । बिभ्र॑ता । रथे॑ । दा॒स्वांस॑म् । उप॑ । ग॒च्छ॒त॒म्॥
पदार्थ : हे (अश्विना) सूर्य्य वायु के समान कर्म और (दस्रा) दुःखों के दूर करनेवाले ! (वसु) सबसे उत्तम धन को (बिभ्रता) धारण करते तथा (ऋतावृधा) यथार्थ गुण संयुक्त प्राप्ति साधन से बढ़े हुए सभा और सेना के पति आप (अद्य) आज वर्त्तमान दिन में (मधुमत्तमम्) अत्यन्त मधुरादिगुणों से युक्त (सोमम्) वीर रस की (पातम्) रक्षा करो (अथ) तत्पश्चात् पूर्वोक्त (रथे) विमानादि यान में स्थित होकर (दाश्वांसम्) देने वाले मनुष्य के (उपगच्छतम्) समीप प्राप्त हुआ कीजिये ॥३॥
भावार्थ : यहां वाचकलुप्तोपमालंकार है। जैसे वायु से सूर्य्य चन्द्रमा की पुष्टि और अन्धेर का नाश होता है वैसे ही सभा और सेना के पतियों से प्रजास्थ प्राणियों की संतुष्टि दुःखों का नाश और धन की वृद्धि होती है ॥३॥
In Sanskrit:
ऋषि : प्रस्कण्वः काण्वः | देवता : अश्विनौ | छन्द : पथ्यावृहती | स्वर : मध्यमः
विषय : (अश्विना) सूर्य्यवायुसदृक्कर्मकारिणौ सभासेनेशौ (मधुमत्तमम्) अतिशयेन प्रशस्तैर्मधुरादिगुणैरुपेतम् (पातम्) रक्षतम् (सोमम्) वीररसादिकम् (ऋतावृधा) यावृतेन यथार्थगुणेन प्राप्तिसाधकेन वर्धयेते तौ (अथ) आनन्तर्य्य (अद्य) अस्मिन् वर्त्तमाने दिने (दस्रा) दुःखोपक्षेतारौ (वसु) सर्वोत्तमं धनम् (बिभ्रता) धरन्तौ (रथे) विमानादियाने (दाश्वांसम्) दातारम् (उप) सामीप्ये (गच्छतम्) प्राप्नुतम् ॥३॥
पदपाठ : अश्वि॑ना । मधु॑मत्ऽतमम् । पा॒तम् । सोम॑म् । ऋ॒त॒ऽवृ॒धा॒ । अथ॑ । अ॒द्य । द॒स्रा॒ । वसु॑ । बिभ्र॑ता । रथे॑ । दा॒स्वांस॑म् । उप॑ । ग॒च्छ॒त॒म्॥
पदार्थ : हे अश्विना सूर्य्यवायुवद्वर्त्तमानौ दस्रा वसु बिभ्रतर्तावृधा सभासेनाध्यक्षौ युवामद्य मधुमत्तमं सोमं पातमथोक्ते रथे स्थित्वा दाश्वांसमुपगच्छतम् ॥३॥
अन्वय : पुनस्तौ कीदृशावित्युपदिश्यते।
भावार्थ : अत्र वाचकलुप्तोपमालंकारः। यथा वायुना सोमसूर्य्ययोः पुष्टिस्तमोनाशश्च भवति तथैव सभासेनेशाभ्यां प्रजानां दुःखोपक्षयो धनवृद्धिश्च जायते ॥३॥