Rigveda / 7 / 56 / 10
प्रि॒या वो॒ नाम॑ हुवे तु॒राणा॒मा यत्तृ॒पन्म॑रुतो वावशा॒नाः ॥१०॥
Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 56 | Mantra No : 10
In English:
Seer : vasiShThaH | Devta : marutaH | Metre : aarchyuShNik | Tone : RRIShabhaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : priyaa vo naama huve turaaNaamaa yattRRipanmaruto vaavashaanaaH .10.
Component Words : priyaa. vaH. naama. huve. turaaNaam. aa. yat. tRRipat. marutaH. vaavashaanaaH .10.
In Hindi:
ऋषि : वसिष्ठः | देवता : मरुतः | छन्द : आर्च्युष्णिक् | स्वर : ऋषभः
विषय : फिर मनुष्य क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥
पदपाठ : प्रि॒या। वः॒। नाम॑। हु॒वे॒। तु॒राणा॑म्। आ। यत्। तृ॒पत्। म॒रु॒तः॒। वा॒व॒शा॒नाः ॥१०॥
पदार्थ : हे (वावशानाः) कामना करते हुए (मरुतः) प्राण के समान प्यारे विद्वानो ! (तुराणाम्) शीघ्र करनेवालों (वः) आप लोगों के (प्रिया) मनोहर (नाम) नामों को मैं (हुवे) प्रशंसता हूँ अर्थात् मैं उनकी प्रशंसा करता हूँ (यत्) जो (आ, तृपत्) अच्छे प्रकार तृप्त होता है उस का और मेरा सत्कार करो ॥१०॥
भावार्थ : जो सब के प्रियाचरण करने और सुख की कामना करनेवाले मनुष्य वर्त्तमान हैं, वे ही प्रिय सुखों को पाते हैं ॥१०॥
In Sanskrit:
ऋषि : वसिष्ठः | देवता : मरुतः | छन्द : आर्च्युष्णिक् | स्वर : ऋषभः
विषय : पुनर्मनुष्याः किं कुर्युरित्याह ॥
पदपाठ : प्रि॒या। वः॒। नाम॑। हु॒वे॒। तु॒राणा॑म्। आ। यत्। तृ॒पत्। म॒रु॒तः॒। वा॒व॒शा॒नाः ॥१०॥
पदार्थ : (प्रिया) प्रियाणि कमनीयानि (वः) युष्माकम् (नाम) नामानि (हुवे) प्रशंसामि (तुराणाम्) सद्यःकारिणाम् (आ) (यत्) यः (तृपत्) तृप्यति (मरुतः) प्राण इव प्रिया विद्वांसः (वावशानाः) कामयमानाः ॥१०॥
अन्वय : हे वावशाना मरुतस्तुराणां वः प्रिया नामाहं हुवे यद्यः आतृपत् तं मा च यूयं सत्कुरुत ॥१०॥
भावार्थ : ये सर्वेषां प्रियाचरणाः सुखं कामयमाना मनुष्या वर्तन्ते त एव प्रियाणि सुखानि लभन्ते ॥१०॥