Rigveda / 7 / 56 / 12
शुची॑ वो ह॒व्या म॑रुतः॒ शुची॑नां॒ शुचिं॑ हिनोम्यध्व॒रं शुचि॑भ्यः। ऋ॒तेन॑ स॒त्यमृ॑त॒साप॑ आय॒ञ्छुचि॑जन्मानः॒ शुच॑यः पाव॒काः ॥१२॥
Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 56 | Mantra No : 12
In English:
Seer : vasiShThaH | Devta : marutaH | Metre : nichRRittriShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation Under Process
Verse : shuchii vo havyaa marutaH shuchiinaa.m shuchi.m hinomyadhvara.m shuchibhyaH. RRItena satyamRRitasaapa aaya~nChuchijanmaanaH shuchayaH paavakaaH .12.
Component Words : shuchii. vaH. havyaa. marutaH. shuchiinaam. shuchim. hinomi. adhvaram. shuchi.abhyaH. RRItena. satyam. RRIta.asaapaH. aayan. shuchi.ajanmaanaH. shuchayaH. paavakaaH .12.
In Hindi:
ऋषि : वसिष्ठः | देवता : मरुतः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : कौन इस संसार में पवित्र होते हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥
पदपाठ : शुची॑। वः॒। ह॒व्या। म॒रु॒तः॒। शुची॑नाम्। शुचि॑म्। हि॒नो॒मि॒। अ॒ध्व॒रम्। शुचि॑ऽभ्यः। ऋ॒तेन॑। स॒त्यम्। ऋ॒त॒ऽसापः॑। आ॒य॒न्। शुचि॑ऽजन्मानः। शुच॑यः। पा॒व॒काः ॥१२॥
पदार्थ : हे (पावकाः) अग्नि के समान प्रताप सहित वर्त्तमान (शुचयः) पवित्र (शुचिजन्मानः) पवित्र जन्मवाले (ऋतसापः) जो सत्य से प्रतिज्ञा करते हैं वे (मरुतः) मरणधर्मा मनुष्यो (शुचीनाम्) पवित्र आचरण करनेवाले (वः) तुम लोगों के जो (शुची) पवित्र (हव्या) देने लेने योग्य वस्तु वर्त्तमान हैं उन (शुचिभ्यः) पवित्र वस्तुओं से वा पवित्र विद्वानों से (शुचिम्) पवित्र को और (ऋतेन) यथार्थ भाव से (सत्यम्) अव्यभिचारी नित्य (अध्वरम्) न नष्ट करने योग्य व्यवहार को (आयन्) जो प्राप्त होते हैं उन्हें (हिनोमि) बढ़ाता हूँ, उस मुझे सब बढ़ावें ॥१२॥
भावार्थ : जिनके पिछले काम पुण्यरूप हैं, वे ही पवित्र जन्मवाले हैं अथवा जिनके वर्त्तमान में धर्मयुक्त आचरण हैं, वे पवित्रजन्मा होते हैं ॥१२॥
In Sanskrit:
ऋषि : वसिष्ठः | देवता : मरुतः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : केऽत्र संसारे पवित्रा जायन्त इत्याह ॥
पदपाठ : शुची॑। वः॒। ह॒व्या। म॒रु॒तः॒। शुची॑नाम्। शुचि॑म्। हि॒नो॒मि॒। अ॒ध्व॒रम्। शुचि॑ऽभ्यः। ऋ॒तेन॑। स॒त्यम्। ऋ॒त॒ऽसापः॑। आ॒य॒न्। शुचि॑ऽजन्मानः। शुच॑यः। पा॒व॒काः ॥१२॥
पदार्थ : (शुची) शुचीनि पवित्राणि (वः) युष्माकम् (हव्या) दातुमादातुमर्हाणि (मरुतः) मरणधर्माणो मनुष्याः (शुचीनाम्) पवित्राचाराणाम् (शुचिम्) पवित्रम् (हिनोमि) वर्धयामि (अध्वरम्) अहिंसनीयं यज्ञम् (शुचिभ्यः) पवित्रेभ्यो विद्वद्भ्यः पदार्थेभ्यो वा (ऋतेन) यथार्थेन (सत्यम्) अव्यभिचारि नित्यम् (ऋतसापः) ये ऋतेन सपन्ति प्रतिज्ञां कुर्वन्ति ते (आयन्) आगच्छन्ति प्राप्नुवन्ति (शुचिजन्मानः) पवित्रजन्मवन्तः (शुचयः) पवित्राः (पावकाः) वह्नय इव वर्त्तमानाः ॥१२॥
अन्वय : हे पावका इव शुचयः शुचिजन्मान ऋतसापो मरुतः शुचीनां वो यानि शुची हव्यास्सन्ति तेभ्यः शुचिभ्यः शुचिमृतेन सत्यमध्वरं य आयँस्तानहं हिनोमि तं मां सर्वे वर्धयत ॥१२॥
भावार्थ : येषां प्राक्कर्माणि पुण्यात्मकानि सन्ति त एव पवित्रजन्मानोऽथवा येषां वर्तमाने धर्माचरणानि सन्ति ते पवित्रजन्मानो भवन्ति ॥१२॥