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Rigveda / 7 / 56 / 17

द॒श॒स्यन्तो॑ नो म॒रुतो॑ मृळन्तु वरिव॒स्यन्तो॒ रोद॑सी सु॒मेके॑। आ॒रे गो॒हा नृ॒हा व॒धो वो॑ अस्तु सु॒म्नेभि॑र॒स्मे व॑सवो नमध्वम् ॥१७॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 56 | Mantra No : 17

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : मरुतः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर कौन राजजन श्रेष्ठ हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : द॒श॒स्यन्तः॑। नः॒। म॒रुतः॑। मृ॒ळ॒न्तु॒। व॒रि॒व॒स्यन्तः॑। रोद॑सी॒ इति॑। सु॒मेके॒ इति॑ सु॒ऽमेके॑। आ॒रे। गो॒ऽहा। नृ॒ऽहा। व॒धः। वः॒। अ॒स्तु॒। सु॒म्नेभिः॑। अ॒स्मे इति॑। व॒स॒वः॒। न॒म॒ध्व॒म् ॥१७॥

पदार्थ : हे वीरो (मरुतः) प्राणों के समान ! (दशस्यन्तः) बल करते और (सुमेके) एक से रूपवाले (रोदसी) आकाश और पृथिवी को (वरिवस्यन्तः) सेवते हुए जन (नः) हम लोगों को (मृळन्तु) सुख देवें और (वः) तुम्हारे (आरे) दूर देश में (गोहा) गो हत्यारा (नृहा) और मनुष्य हत्यारा (वधः) वह दोनों जिससे मारते हैं वह (अस्तु) दूर हो जाये (वसवः) निवास दिखानेवाले तुम लोग (सुम्नेभिः) सुखों के साथ (अस्मे) हम लोगों को (नमध्वम्) नमो ॥१७॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। वे ही राजजन उत्तम हैं, जो श्रेष्ठों को सुख देकर दुष्टों को मारते हैं और आप्त जनों को नम के दुष्टों में उग्र होते हैं ॥१७॥