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Rigveda / 7 / 56 / 21

मा वो॑ दा॒त्रान्म॑रुतो॒ निर॑राम॒ मा प॒श्चाद्द॑ध्म रथ्यो विभा॒गे। आ नः॑ स्पा॒र्हे भ॑जतना वस॒व्ये॒३॒॑ यदीं॑ सुजा॒तं वृ॑षणो वो॒ अस्ति॑ ॥२१॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 56 | Mantra No : 21

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : मरुतः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर मनुष्य कैसे होते हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : मा। वः॒। दा॒त्रात्। म॒रु॒तः॒। निः। अ॒रा॒म॒। मा। प॒श्चात्। द॒ध्म॒। र॒थ्यः॒। वि॒ऽभा॒गे। आ। नः॒। स्पा॒र्हे। भ॒ज॒त॒न॒। व॒स॒व्ये॑। यत्। ई॒म्। सु॒ऽजा॒तम्। वृ॒ष॒णः॒। वः॒। अस्ति॑ ॥२१॥

पदार्थ : हे (मरुतः) पवनों के समान मनुष्यो ! जैसे हम लोग (वः) तुम को (दात्रात्) दान से (मा) मत (निः, अराम) अलग करें, हे (रथ्यः) बहुत रथोंवालो ! हम लोग (पश्चात्) पीछे से (मा, दध्म) मत जावें, हे (वृषणः) वर्षा करानेवालो ! (वः) तुम्हारा (यत्) जो (सुजातम्) सुन्दर प्रसिद्ध सुख (अस्ति) है उस (वसव्ये) द्रव्यों में हुए (स्पार्हे) इच्छा करने योग्य (विभागे) विभाग जिसमें कि बांटते हैं उस में तुम (नः) हम लोगों को (ईम्) सब ओर से (आ, भजतन) अच्छे प्रकार सेवो ॥२१॥

भावार्थ : मनुष्य सदैव विद्वानों के लिये देने योग्य सत्यासत्य व्यवहार से अलग न होवें, जो कुछ भी उत्तम सुख हो, उसको सब के लिये निवेदन करें ॥२१॥