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Rigveda / 7 / 56 / 25

तन्न॒ इन्द्रो॒ वरु॑णो मि॒त्रो अ॒ग्निराप॒ ओष॑धीर्व॒निनो॑ जुषन्त। शर्म॑न्त्स्याम म॒रुता॑मु॒पस्थे॑ यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः ॥२५॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 56 | Mantra No : 25

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : मरुतः | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर मनुष्य किसके सदृश क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : तत्। नः॒। इन्द्रः॑। वरु॑णः। मि॒त्रः। अ॒ग्निः। आपः॑। ओष॑धीः। व॒निनः॑। जु॒ष॒न्त॒। शर्म॑न्। स्या॒म॒। म॒रुता॑म्। उ॒पऽस्थे॑। यू॒यम्। पा॒त॒। स्व॒स्तिऽभिः॑। सदा॑। नः॒ ॥२५॥

पदार्थ : हे विद्वानो ! जैसे (इन्द्रः) बिजुली (वरुणः) जल [=जलाधिपति] (मित्रः) मित्र (अग्निः) अग्नि (आपः) जल (ओषधीः) सोमलता आदि ओषधियों को (वनिनः) बहुत किरणें जिनमें पड़तीं ऐसे वन में वर्त्तमान वृक्ष आदि (नः) हम लोगों के (तत्) पूर्वोक्त सम्पूर्ण कर्म वा वस्तु की (जुषन्त) सेवा करें और जिस (शर्मन्) सुखकारक गृह में (मरुताम्) पवनों वा विद्वानों के (उपस्थे) समीप में हम लोग सुखी (स्याम) होवें उसमें (यूयम्) आप लोग (स्वस्तिभिः) कल्याणों से (नः) हम लोगों की (सदा) सदा (पात) रक्षा कीजिये ॥२५॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । हे मनुष्यो ! जैसे बिजुली आदि पदार्थ सब की उन्नति और नाश करते हैं, वैसे ही दोषों का नाश कर और गुणों की वृद्धि करके सब की रक्षा को सब सदा करें ॥२५॥ इस सूक्त में वायु, विद्वान्, राजा, शूरवीर, अध्यापक, उपदेशक और रक्षक के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह छप्पनवाँ सूक्त और छब्बीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥