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Rigveda / 1 / 47 / 8

अ॒र्वाञ्चा॑ वां॒ सप्त॑योऽध्वर॒श्रियो॒ वह॑न्तु सव॒नेदुप॑ । इषं॑ पृ॒ञ्चन्ता॑ सु॒कृते॑ सु॒दान॑व॒ आ ब॒र्हिः सी॑दतं नरा ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 47 | Mantra No : 8

In Hindi:

ऋषि : प्रस्कण्वः काण्वः | देवता : अश्विनौ | छन्द : निचृत्सतः पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर वे किस हेतुवाले हैं, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदपाठ : अ॒र्वाञ्चा॑ । वा॒म् । सप्त॑यः । अ॒ध्व॒र॒ऽश्रियः॑ । वह॑न्तु । सव॑ ना । इत् । उप॑ । इष॑म् । पृ॒ञ्चन्ता॑ । सु॒ऽकृते॑ । सु॒ऽदान॑वे । आ । ब॒र्हिः । सि॒द॒त॒म् । न॒रा॒॥

पदार्थ : हे (अर्वाञ्चा) घोड़े के समान वेगों को प्राप्त (पृञ्चन्ता) सुखों के करानेवाले (नरा) सभासेनापति ! आप जो (वाम्) तुम्हारे (सप्तयः) भाफ आदि अश्वयुक्त (सुकृते) सुन्दर कर्म करने (सुदानवे) उत्तम दाता मनुष्य के वास्ते (इषम्) धर्म की इच्छा वा उत्तम अन्न आदि (बर्हिः) आकाश वा श्रेष्ठ पदार्थ (सवना) यज्ञ की सिद्धि की क्रिया (अध्वरश्रियः) और पालनीय चक्रवर्त्ती राज्य की लक्ष्मियों को (आवहन्तु) प्राप्त करावें उन पुरुषों का (उपसीदतम्) सङ्ग सदा किया करो ॥८॥

भावार्थ : राजा और प्रजाजनों को चाहिये कि आपस में उत्तम पदार्थों को दे-लेकर सुखी हों ॥८॥