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Rigveda / 1 / 48 / 15

उषो॒ यद॒द्य भा॒नुना॒ वि द्वारा॑वृ॒णवो॑ दि॒वः । प्र नो॑ यच्छतादवृ॒कं पृ॒थु च्छ॒र्दिः प्र दे॑वि॒ गोम॑ती॒रिषः॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 48 | Mantra No : 15

In Hindi:

ऋषि : प्रस्कण्वः काण्वः | देवता : उषाः | छन्द : पथ्यावृहती | स्वर : मध्यमः

विषय : फिर वह क्या करती है, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदपाठ : उषः॑ । यत् । अ॒द्य । भा॒नुना॑ । वि । द्वारौ॑ । ऋ॒णवः॑ । दि॒वः । प्र । नः॒ । य॒च्छ॒ता॒त् । अ॒वृ॒कम् । पृ॒थु । छ॒र्दिः । प्र । दे॒वि॒ । गोऽम॑तीः । इषः॑॥

पदार्थ : हे (देवि) दिव्य गुण युक्त स्त्री ! तू जैसे (उषाः) प्रभात समय (अद्य) इस दिन में (भानुना) अपने प्रकाश से (द्वारौ) गृहादि वा इन्द्रियों के प्रवेश और निकलने के निमित्त छिद्र (प्रार्णवः) अच्छे प्रकार प्राप्त होती और जैसे (नः) हम लोगों के लिये (यत्) (अवृकम्) हिंसक प्राणियों से भिन्न (पृथु) सब ऋतुओं के स्थान और अवकाश के योग्य होने से विशाल (छर्दिः) शुद्ध आच्छादन से प्रकाशमान घर है और जैसे (दिवः) प्रकाशादि गुण (गोमतीः) बहुत किरणों से युक्त (इषः) इच्छाओं को देती है वैसे (विप्रयच्छतात्) संपूर्ण# दिया कर ॥१५॥ #[सं० भा० के अनुसार-(तू भली प्रकार)। सं०]

भावार्थ : इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है। जैसे उषा अपने प्रकाश से अतीत वर्त्तमान और आनेवाले दिनों में सब मार्ग और द्वारों को प्रकाश करती है वैसे ही मनुष्यों को चाहिये कि सब ऋतुओं में सुख देनेवाले घरों को रच उनमें सब भोग्य पदार्थों को स्थापन और वह सब स्त्री के आधीन कर प्रतिदिन सुखी रहैं ॥१५॥