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Rigveda / 1 / 50 / 3

अदृ॑श्रमस्य के॒तवो॒ वि र॒श्मयो॒ जनाँ॒ अनु॑ । भ्राज॑न्तो अ॒ग्नयो॑ यथा ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 50 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : प्रस्कण्वः काण्वः | देवता : सूर्यः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : फिर वे कैसे हों, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदपाठ : अदृ॑श्रम् । अ॒स्य॒ । के॒तवः॑ । वि । र॒श्मयः॑ । जना॑न् । अनु॑ । भ्राज॑न्तः । अ॒ग्नयः॑ । य॒था॒॥

पदार्थ : (यथा) जैसे (अस्य) इस सविता के (भ्राजन्तः) प्रकाशमान (अग्नयः) प्रज्वलित (केतवः) जनानेवाली (रश्मयः) किरणें (जनान) मनुष्यादि प्राणियों को (अनु) अनुकूलता से प्रकाश करती हैं वैसे मैं अपनी विवाहित स्त्री और अपने पति ही को समागम के योग्य देखूं अन्य को नहीं ॥३॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालंकार है। जैसे प्रज्वलित हुए अग्नि और सूर्य्यादिक बाहर सब में प्रकाशमान हैं वैसे ही अन्तरात्मा में ईश्वर का प्रकाश वर्त्तमान है इसके जानने के लिये सब मनुष्यों को प्रयत्न करना योग्य है उस परमात्मा की आज्ञा से परस्त्री के साथ पुरुष और परपुरुष के संग स्त्री व्यभिचार को सब प्रकार छोड़ के पाणिगृहीत अपनी-२ स्त्री और अपने-२ पुरुष के साथ ऋतुगामी ही होवें ॥३॥