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Rigveda / 1 / 50 / 5

प्र॒त्यङ् दे॒वानां॒ विशः॑ प्र॒त्यङ्ङुदे॑षि॒ मानु॑षान् । प्र॒त्यङ्विश्वं॒ स्व॑र्दृ॒शे ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 50 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : प्रस्कण्वः काण्वः | देवता : सूर्यः | छन्द : यवमध्याविराड्गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : फिर वह जगदीश्वर कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदपाठ : प्र॒त्यङ् । दे॒वाना॑म् । विशः॑ । प्र॒त्यङ् । उत् । ए॒षि॒ । मानु॑षान् । प्र॒त्यङ् । विश्व॑म् । स्वः॑ । दृ॒शे॥

पदार्थ : हे जगदीश्वर ! जो आप (देवानाम्) दिव्य पदार्थों वा विद्वानों के (विशः) प्रजा (मानुषान्) मनुष्यों को (प्रत्यङ्ङुदेषि) अच्छे प्रकार प्राप्त हो और सब के आत्माओं में (प्रत्यङ्) प्राप्त होते हो इससे (विश्वस्वर्दृशे) सब सुखों के देखने के अर्थ सबों के (प्रत्यङ्) प्रत्यगात्मरूप से उपासनीय हो ॥५॥

भावार्थ : जिससे ईश्वर सब कहीं व्यापक सबके आत्मा का जाननेवाला और सब कर्मों का साक्षी है इसलिये यही सब सज्जन लोगों को नित्य उपासना करने के योग्य है ॥५॥