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Rigveda / 1 / 51 / 2

अ॒भीम॑वन्वन्त्स्वभि॒ष्टिमू॒तयो॑ऽन्तरिक्ष॒प्रां तवि॑षीभि॒रावृ॑तम्। इन्द्रं॒ दक्षा॑स ऋ॒भवो॑ मद॒च्युतं॑ श॒तक्र॑तुं॒ जव॑नी सू॒नृतारु॑हत् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 51 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : सव्य आङ्गिरसः | देवता : इन्द्र: | छन्द : विराड्जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

पदपाठ : अ॒भि। ई॒म्। अ॒व॒न्व॒न्। सु॒ऽअ॒भि॒ष्टिम्। ऊ॒तयः॑। अ॒न्त॒रि॒क्ष॒ऽप्राम्। तवि॑षीभिः। आऽवृ॑तम्। इन्द्र॑म्। दक्षा॑सः। ऋ॒भवः॑। म॒द॒ऽच्युत॑म्। श॒तऽक्र॑तुम्। जव॑नी। सू॒नृता॑। आ। अ॒रु॒ह॒त् ॥

पदार्थ : हे सेनापते ! जिस आपकी (ऊतयः) रक्षा प्रजा का पालन करती हैं (दक्षासः) विज्ञानवृद्ध शीघ्र कार्य को सिद्ध करनेवाले (ऋभवः) मेधावी विद्वान् लोग जिस (स्वभिष्टिम्) उत्तम इष्टियुक्त (अन्तरिक्षप्राम्) अपने तेज से अन्तरिक्ष अर्थात् अवकाश में सबको सुख से पूर्ण करने (मदच्युतम्) हर्षादि को देनेवाले (शतक्रतुम्) अनेक कर्मों के कर्ता (तविषीभिः) बल आकर्षण आदि गुणों से युक्त सेना से (आवृतम्) संयुक्त (इन्द्रम्) बिजुली के सदृश वर्त्तमान आपको (अभ्यवन्वन्) कार्यों को करने के लिये सब प्रकार से वृद्धियुक्त करते हैं जिस को (जवनी) वेगयुक्त (सूनृता) अन्नादि पदार्थों को सिद्ध करने हारी राजनीति (आरुहत्) बढ़ के प्राप्त होवे, उस आपकी रक्षा हम किया करें ॥ २ ॥

भावार्थ : धर्मात्मा बुद्धिमान् लोग जिस का आश्रय करें, उसी का शरण ग्रहण सब मनुष्य करें ॥ २ ॥