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Rigveda / 1 / 51 / 10

तक्ष॒द्यत्त॑ उ॒शना॒ सह॑सा॒ सहो॒ वि रोद॑सी म॒ज्मना॑ बाधते॒ शवः॑। आ त्वा॒ वात॑स्य नृमणो मनो॒युज॒ आ पूर्य॑माणमवहन्न॒भि श्रवः॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 51 | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : सव्य आङ्गिरसः | देवता : इन्द्र: | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर वह सभाध्यक्ष कैसा हो, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

पदपाठ : तक्ष॑त्। यत्। ते॒। उ॒शना॑। सह॑सा। सहः॑। वि। रोद॑सी॒ इति॑। म॒ज्मना॑। बा॒ध॒ते॒। शवः॑। आ। त्वा॒। वात॑स्य। नृ॒ऽम॒नः॒। म॒नः॒ऽयुजः॑। आ। पूर्य॑माणम्। अ॒व॒ह॒न्। अ॒भि। श्रवः॑ ॥

पदार्थ : हे (नृमणाः) मनुष्यों में मन देनेवाले (उशना) कामयमान विद्वान् आप ! (सहसा) अपने सामर्थ्य से शत्रुओं के (सहः) बल का हनन कर के जैसे सूर्य (रोदसी) भूमि और प्रकाश को करता है, वैसे (मज्मना) शुद्ध बल से (शवः) शत्रुओं के बल को (विबाधते) विलोड़न वा (आतक्षत्) छेदन करते हो और (ते) आप के (मनोयुजः) मन से युक्त होनेवाले भृत्य (त्वा) आप का आश्रय ले के (ते) आप के (वातस्य) बलयुक्त वायु के सम्बन्धी (आपूर्यमाणम्) न्यूनतारहित (श्रवः) श्रवण और अन्नादि को (अभ्यावहन्) प्राप्त होवें ॥ १० ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। विद्वान् सभाध्यक्ष के विना पृथिवी के राज्य की व्यवस्था शत्रुओं के बल की हानि विद्यादि सद्गुणों का प्रकाश और उत्तम अन्नादि की प्राप्ति नहीं होती ॥ १० ॥