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Rigveda / 1 / 53 / 9

त्वमे॒ताञ्ज॑न॒राज्ञो॒ द्विर्दशा॑ब॒न्धुना॑ सु॒श्रव॑सोपज॒ग्मुषः॑। ष॒ष्टिं स॒हस्रा॑ नव॒तिं नव॑ श्रु॒तो नि च॒क्रेण॒ रथ्या॑ दु॒ष्पदा॑वृणक् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 53 | Mantra No : 9

In Hindi:

ऋषि : सव्य आङ्गिरसः | देवता : इन्द्र: | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर वह क्या करे, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

पदपाठ : त्वम्। ए॒तान्। ज॒न॒ऽराज्ञः॑। द्विः। दश॑। अ॒ब॒न्धुना॑। सु॒ऽश्रव॑सा। उ॒प॒ऽज॒ग्मुषः॑। ष॒ष्टिम्। स॒हस्रा॑। न॒व॒तिम्। नव॑। श्रु॒तः। नि। च॒क्रेण॑। रथ्या॑। दुः॒ऽपदा॑। अ॒वृ॒ण॒क् ॥

पदार्थ : हे सभा और सेना के अध्यक्ष ! जैसे (श्रुतः) श्रवण करनेवाले (त्वम्) तुम (एतान्) इन (अबन्धुना) अबन्धु अर्थात् मित्ररहित अनाथ वा (सुश्रवसा) उत्तम श्रवण अन्नयुक्त मित्र के साथ वर्त्तमान (उपजग्मुषः) समीप होनेवाले (षष्टिम्) साठ (नवतिम्) नव्वे (नव) नौ (दश) (सहस्राणि) दस हजार (जनराज्ञः) धार्मिक राजायुक्त मनुष्यादिकों को (दुष्पदा) दुःख से प्राप्त होने योग्य (रथ्या) रथ को प्राप्त करनेवाले (चक्रेण) शस्त्र विशेष वा चक्रादि अङ्क युक्त यानसमूह से (द्विः) दो बेर (न्यवृणक्) नित्य दुःखों से अलग करते वा दुष्टों को दूर करते हो, वैसे तू भी पापाचरण से सदा दूर रह ॥ ९ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। चक्रवर्त्ति राजा को माण्डलिक वा महामाण्डलिक राजा भृत्य गृहस्थ वा विरक्तों को प्रसन्न और शरणागत आये हुए मनुष्य की रक्षा करके धर्मयुक्त सार्वभौम राज्य का यथावत् पालन करना चाहिये और दश आदि सब संख्यावाची शब्द उपलक्षण के लिये हैं, इससे राजपुरुषों को योग्य है कि सब की यथावत् रक्षा वा दुष्टों को दण्ड देवे ॥ ९ ॥