Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 1 / 54 / 5

नि यद्वृ॒णक्षि॑ श्वस॒नस्य॑ मू॒र्धनि॒ शुष्ण॑स्य चिद्व्र॒न्दिनो॒ रोरु॑व॒द्वना॑। प्रा॒चीने॑न॒ मन॑सा ब॒र्हणा॑वता॒ यद॒द्या चि॑त्कृ॒णवः॒ कस्त्वा॒ परि॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 54 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : सव्य आङ्गिरसः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर वह कैसा हो, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

पदपाठ : नि। यत्। वृ॒णक्षि॑। श्व॒स॒नस्य॑। मू॒र्धनि॑। शुष्ण॑स्य। चि॒त्। व्र॒न्दिनः॑। रोरु॑वत्। वना॑। प्रा॒चीने॑न। मन॑सा। ब॒र्हणा॑ऽवता। यत्। अ॒द्य। चि॒त्। कृ॒णवः॑। कः। त्वा॒। परि॑ ॥

पदार्थ : हे सभाध्यक्ष विद्वान् ! (यत्) जो आप जैसे सविता (वना) रश्मियुक्त मेघ का निवारण करता है, वैसे (प्राचीनेन) सनातन (बर्हणावता) अनेक प्रकार वृद्धियुक्त (मनसा) विज्ञान से (श्वसनस्य) प्राणवद् बलवान् (शुष्णस्य) शोषणकर्त्ता के (मूर्द्धनि) उत्तम अङ्ग में प्रहार के (चित्) समान (व्रन्दिनः) निन्दित कर्म करनेवाले दुष्ट मनुष्यों को (रोरुवत्) रोदन कराते हुए (यत्) जिस कारण (अद्य) आज (निवृणक्षि) निरन्तर उन दुष्टों को अलग करते हो, इससे (चित्) भी (त्वा) आप के (कृणवः) मारने को (कः) कोई भी समर्थ (परि) नहीं हो सकता ॥ ५ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलु्प्तोपमालङ्कार है। जैसे परमेश्वर अपने अनादि विज्ञान युक्त न्याय से सबको शिक्षा देता और सूर्य मेघ को काट-काट कर गिराता है, वैसे ही सभापति आदि धर्म से सब की शिक्षा देवें और शत्रुओं को नष्ट-भ्रष्ट करें ॥ ५ ॥