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Rigveda / 1 / 54 / 9

तुभ्येदे॒ते ब॑हु॒ला अद्रि॑दुग्धाश्चमू॒षद॑श्चम॒सा इ॑न्द्र॒पानाः॑। व्य॑श्नुहि त॒र्पया॒ काम॑मेषा॒मथा॒ मनो॑ वसु॒देया॑य कृष्व ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 54 | Mantra No : 9

In Hindi:

ऋषि : सव्य आङ्गिरसः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर वह क्या करे, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

पदपाठ : तुभ्य॑। इत्। ए॒ते। ब॒हु॒लाः। अद्रि॑ऽदुग्धाः। च॒मू॒ऽसदः॑। च॒म॒साः। इ॒न्द्र॒ऽपानाः॑। वि। अ॒श्नु॒हि॒। त॒र्पय॑। काम॑म्। ए॒षा॒म्। अथ॑। मनः॑। व॒सु॒ऽदेया॑य। कृ॒ष्व॒ ॥

पदार्थ : हे (इन्द्र) सभाध्यक्ष ! जैसे (एते) ये (बहुलाः) बहुत सुख वा कर्मों को देनेवाले (इन्द्रपानाः) परमैश्वर्य के हेतु सूर्य्य को प्राप्त होने हारे (चमसा) मेघ सब कामों को पूर्ण करते हैं, वैसे (अद्रिदुग्धाः) मेघ वा पर्वतों से प्राप्तविद्या (चमूषदः) सेनाओं में स्थित शूरवीर पुरुष (तुभ्यम्) आपको तृप्त करें तथा आप इन को (वसुदेयाय) सुन्दर धन देने के लिये (मनः) मन (कृष्व) कीजिये और आप इन को (तर्पय) तृप्त वा (एषाम्) इन की (कामान्) कामना पूर्ण कीजिये (अथ) इस के अनन्तर (इत्) ही सब कामनाओं को (व्यश्नुहि) प्राप्त हूजिये ॥ ९ ॥

भावार्थ : सभा आदि के अध्यक्ष उत्तम शिक्षा वा पालन से उत्पादन किये हुए शूरवीरों और प्रजा की निरन्तर पालना करके इनके लिये सब सुखों को देवें और वे प्रजा के पुरुष भी सभाध्यक्षादिकों को निरन्तर सन्तुष्ट रक्खें, जिससे सब कामना पूर्ण होवें ॥ ९ ॥