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Rigveda / 1 / 55 / 3

त्वं तमि॑न्द्र॒ पर्व॑तं॒ न भोज॑से म॒हो नृ॒म्णस्य॒ धर्म॑णामिरज्यसि। प्र वी॒र्ये॑ण दे॒वताऽति॑ चेकिते॒ विश्व॑स्मा उ॒ग्रः कर्म॑णे पु॒रोहि॑तः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 55 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : सव्य आङ्गिरसः | देवता : इन्द्र: | छन्द : विराड्जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर वह कैसा हो, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

पदपाठ : त्वम्। तम्। इ॒न्द्र॒। पर्व॑तम्। न। भोज॑से। म॒हः। नृ॒म्णस्य॑। धर्म॑णाम्। इ॒र॒ज्य॒सि॒। प्र। वी॒र्ये॑ण। दे॒वताति॑। चे॒कि॒ते॒। विश्व॑स्मै। उ॒ग्रः। कर्म॑णे। पु॒रःऽहि॑तः ॥

पदार्थ : हे (इन्द्र) सभाध्यक्ष ! जो (देवता) विद्वान् (उग्रः) तीव्रकारी (पुरोहितः) पुरोहित के समान उपकार करनेवाले (त्वम्) आप जैसे बिजुली (पर्वतम्) मेघ के आश्रय करनेवाले बादलों के (न) समान (वीर्येण) पराक्रम से (भोजसे) पालन वा भोग के लिये (तम्) उस शत्रु को हनन कर (महः) बड़े (नृम्णस्य) धन और (धर्मणाम्) धर्मों के योग से (अतीरज्यसि) अतिशय ऐश्वर्य करते हो, जो आप (विश्वस्मै) सब (कर्मणे) कर्मों के लिये (प्रचेकिते) जानते हो, वह आप हम लोगों में राजा हूजिये ॥ ३ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्य प्रवृत्ति का आश्रय और धन को सम्पादन करके भोगों को प्राप्त करते हैं, वे सभाध्यक्ष के सहित विद्या, बुद्धि, विनय और धर्मयुक्त वीरपुरुषों की सेना को प्राप्त होकर दुष्ट जनों के विषय में तेजधारी और धर्मात्माओं में क्षमायुक्त हों, वे ही सबके हितकारक होते हैं ॥ ३ ॥