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Rigveda / 1 / 61 / 2

अ॒स्मा इदु॒ प्रय॑इव॒ प्र यं॑सि॒ भरा॑म्याङ्गू॒षं बाधे॑ सुवृ॒क्ति। इन्द्रा॑य हृ॒दा मन॑सा मनी॒षा प्र॒त्नाय॒ पत्ये॒ धियो॑ मर्जयन्त ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 61 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : नोधा गौतमः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

पदपाठ : अ॒स्मै। इत्। ऊँ॒ इति॑। प्रयः॑ऽइव। प्र। यं॒सि॒। भरा॑मि। आ॒ङ्गू॒षम्। बाधे॑। सु॒ऽवृ॒क्ति। इन्द्रा॑य। हृ॒दा। मन॑सा। म॒नी॒षा। प्र॒त्नाय॑। पत्ये॑। धियः॑। म॒र्ज॒य॒न्त॒ ॥

पदार्थ : हे विद्वन् मनुष्य ! तुम (अस्मै) इस (प्रत्नाय) प्राचीन सबके मित्र (पत्ये) स्वामी (इन्द्राय) शत्रुओं को विदारण करनेवाले के लिये (प्रयइव) जैसे प्रीतिकारक अन्न वा धन वैसे (प्रयंसि) सुख देते हो, जिस परमैश्वर्ययुक्त धार्मिक के लिये मैं सब सामग्री अर्थात् (हृदा) हृदय (मनीषा) बुद्धि (मनसा) विज्ञानपूर्वक मन से (सुवृक्ति) उत्तमता से गमन करानेवाले यान को (भरामि) धारण करता वा पुष्ट करता हूँ, जैसे (आङ्गूषम्) युद्ध में प्राप्त हुए शत्रु को (बाधे) ताड़ना देना जिस वीर के वास्ते सब प्रजा के मनुष्य (धियः) बुद्धि वा कर्म को (मर्जयन्त) शुद्ध करते हैं, उस पुरुष के लिये (इत्) ही (उ) तर्क के साथ मैं भी बुद्धि शुद्ध करूँ ॥ २ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को उचित है कि पहिले परीक्षा किये पूर्ण विद्यायुक्त धार्मिक सबके उपकार करनेवाले प्राचीन पुरुष को सभा का अधिपति करें तथा इससे विरुद्ध मनुष्य को स्वीकार नहीं करें और सब मनुष्य उसके प्रिय आचरण करें ॥ २ ॥