Rigveda / 1 / 61 / 7
अ॒स्येदु॑ मा॒तुः सव॑नेषु स॒द्यो म॒हः पि॒तुं प॑पि॒वाञ्चार्वन्ना॑। मु॒षा॒यद्विष्णुः॑ पच॒तं सही॑या॒न्विध्य॑द्वरा॒हं ति॒रो अद्रि॒मस्ता॑ ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 61 | Mantra No : 7
In English:
Seer : nodhaa gautamaH | Devta : indra: | Metre : nichRRittriShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation Under Process
Verse : asyedu maatuH savaneShu sadyo mahaH pitu.m papivaa~nchaarvannaa. muShaayadviShNuH pachata.m sahiiyaanvidhyadvaraaha.m tiro adrimastaa .
Component Words : asya. it. uu.N iti. maatuH. savaneShu. sadyaH. mahaH. pitum. papivaan. chaaru. annaa. muShaayat. viShNuH. pachatam. sahiiyaan. vidhyat. varaaham. tiraH. adrim. astaa .
In Hindi:
ऋषि : नोधा गौतमः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥
पदपाठ : अ॒स्य। इत्। ऊँ॒ इति॑। मा॒तुः। सव॑नेषु। स॒द्यः। म॒हः। पि॒तुम्। प॒पि॒वान्। चारु॑। अन्ना॑। मु॒षा॒यत्। विष्णुः॑। प॒च॒तम्। सही॑यान्। विध्य॑त्। व॒रा॒हम्। ति॒रः। अद्रि॑म्। अस्ता॑ ॥
पदार्थ : जो (अस्य) इस (मातुः) शत्रु और अपने बल का परिमाण करनेवाले सभाध्यक्ष के (सवनेषु) ऐश्वर्यों में (महः) बड़े (पचतम्) परिपक्व (चारु) सुन्दर (पितुम्) संस्कार किये हुए अन्न को (पपिवान्) खाने-पीने तथा (सहीयान्) अतिशय करके सहन करनेवाला वीर मनुष्य (अन्ना) अन्नों को (अस्ता) प्रक्षेपण करने (मुषायत्) अपने को चोर की इच्छा करते हुए के तुल्य (विष्णुः) सब विद्याओं के अङ्गों में व्यापक (अद्रिम्) पर्वताकार (वराहम्) मेघ को (तिरः) नीचे (विध्यत्) गिराते हुए सूर्य के समान शत्रुओं को (सद्यः) शीघ्र नष्ट करे (इदु) वही मनुष्य सेनाध्यक्ष होने के योग्य होता है ॥
भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य अन्न-जल के रसों को चोर के समान हरता वा रक्षा करता हुआ, अपने किरणों से मेघ को हनन कर प्रकट करता हुआ, छिन्न-भिन्न कर अपने विजय को प्राप्त होता है, वैसे ही सेना आदि के अध्यक्ष के सेना आदि ऐश्वर्यों में स्थित हुए शूरवीर पुरुष शत्रुओं का पराजय करें ॥ ७ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : नोधा गौतमः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते ॥
पदपाठ : अ॒स्य। इत्। ऊँ॒ इति॑। मा॒तुः। सव॑नेषु। स॒द्यः। म॒हः। पि॒तुम्। प॒पि॒वान्। चारु॑। अन्ना॑। मु॒षा॒यत्। विष्णुः॑। प॒च॒तम्। सही॑यान्। विध्य॑त्। व॒रा॒हम्। ति॒रः। अद्रि॑म्। अस्ता॑ ॥
पदार्थ : (अस्य) सभाध्यक्षस्य (इत्) अपि (उ) वितर्के (मातुः) परिमाणकर्त्तुः (सवनेषु) ऐश्वर्येषु (सद्यः) समानेऽहनि (महः) महत् (पितुम्) सुसंस्कृतमन्नम् (पपिवान्) रसान् पीतवान् (चारु) सुन्दरम् (अन्ना) अन्नानि (मुषायत्) आत्मनः स्तेयमिच्छत्। अत्र घञर्थे कविधानम् (अष्टा०वा०३.३.५८) इति कः प्रत्ययः, ततः सुप आत्मनः क्यच्। (अष्टा०३.१.८) इति क्यच्, न छन्दस्यपुत्रस्य। (अष्टा०७.४.३५) इतीत्वनिषेधः। (विष्णुः) सर्वविद्याङ्गव्यापनशीलः (पचतम्) परिपक्वम् (वराहम्) मेघम् (सहीयान्) अतिशयेन सोढा (विध्यत्) विध्यति मेघम् (तिरः) अधोगमने (अद्रिम्) पर्वताकारम् (अस्ता) प्रक्षेप्ता ॥ ७ ॥
अन्वय : योऽस्य मातुः सभाद्यध्यक्षस्य सवनेषु महः पचतं चारु पितुं च पपिवान् सहीयान् वीरोऽन्नास्ता मुषायदिव विष्णुः सूर्योऽद्रिं वराहं तिरो विध्यदिव शत्रून् सद्यो हन्यात् स इदु सेनाध्यक्षो योग्यो भवति ॥ ७ ॥
भावार्थ : अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यथा सूर्योऽन्नजलरसान् चोरयन् गोपायन् स्वकिरणैर्मेघं संहत्य प्रकटयन् छित्वा निपात्य विजयते, तथैव सेनाद्यध्यक्षस्य सेनाद्यैश्वर्येषु स्थिताः शूरवीराः पुरुषाः शत्रून् विजयेरन् ॥ ७ ॥