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Rigveda / 1 / 61 / 11

अ॒स्येदु॑ त्वे॒षसा॑ रन्त॒ सिन्ध॑वः॒ परि॒ यद्वज्रे॑ण सी॒मय॑च्छत्। ई॒शा॒न॒कृद्दा॒शुषे॑ दश॒स्यन्तु॒र्वीत॑ये गा॒धं तु॒र्वणिः॑ कः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 61 | Mantra No : 11

In Hindi:

ऋषि : नोधा गौतमः | देवता : इन्द्र: | छन्द : भुरिक्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

पदपाठ : अ॒स्य। इत्। ऊँ॒ इति॑। त्वे॒षसा॑। र॒न्त॒। सिन्ध॑वः। परि॑। यत्। वज्रे॑ण। सी॒म्। अय॑च्छत्। ई॒शा॒न॒ऽकृत्। दा॒शुषे॑। द॒श॒स्यन्। तु॒र्वीत॑ये। गा॒धम्। तु॒र्वणिः॑। क॒रिति॑ कः ॥

पदार्थ : (अस्य) इस सभाध्यक्ष के (त्वेषसा) विद्या, न्याय, बल के प्रकाश के साथ जो वर्त्तमान शूरवीर बिजुली के समान (रन्त) रमण करते हैं (सिन्धवः) समुद्र के समान (वज्रेण) शस्त्र से (सीम्) सब प्रकार शत्रु की सेनाओं को (पर्यच्छत्) निग्रह करता है, वह (दाशुषे) दानशील मनुष्य के (ईशानकृत्) ऐश्वर्ययुक्त करनेवाला (तुर्वीतये) शीघ्र करनेवालों के लिये (दशस्यन्) दशन के समान आचरण करता हुआ (तुर्वणिः) शीघ्र करनेवालों को सेवन करनेवाला मनुष्य (गाधम्) शत्रुओं का विलोडन (कः) करता है ॥ ११ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य सभाध्यक्ष वा सूर्य के सहाय से शत्रु वा मेघादिकों को जीत कर पृथिवी राज्य का सेवन कर सुखी और प्रतापी होता है, वह सब शत्रुओं के बिलोड़ने को योग्य है ॥ ११ ॥