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Rigveda / 1 / 61 / 16

ए॒वा ते॑ हारियोजना सुवृ॒क्तीन्द्र॒ ब्रह्मा॑णि॒ गोत॑मासो अक्रन्। ऐषु॑ वि॒श्वपे॑शसं॒ धियं॑ धाः प्रा॒तर्म॒क्षू धि॒याव॑सुर्जगम्यात् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 61 | Mantra No : 16

In Hindi:

ऋषि : नोधा गौतमः | देवता : इन्द्र: | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर वह सभाध्यक्ष कैसा हो, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ॥

पदपाठ : ए॒व। ते॒। हा॒रि॒ऽयो॒ज॒न॒। सु॒ऽवृ॒क्ति। इन्द्र॑। ब्रह्मा॑णि। गोत॑मासः। अ॒क्र॒न्। आ। ए॒षु॒। वि॒श्वऽपे॑शसम्। धिय॑म्। धाः॒। प्रा॒तः। म॒क्षु। धि॒याऽव॑सुः। ज॒ग॒म्या॒त् ॥

पदार्थ : हे (हारियोजन) यानों में घोड़े वा अग्नि आदि पदार्थ युक्त होनेवालों को पढ़ने वा जाननेवाले (इन्द्र) परम ऐश्वर्य के प्राप्त करानेवाले (धियावसुः) बुद्धि और कर्म के निवास करनेवाले आप जो (एषु) इन स्तुति तथा विद्या पढ़नेवाले मनुष्यों में (विश्वपेशसम्) सब विद्यारूप गुणयुक्त (धियम्) धारणावाली बुद्धि को (प्रातः) प्रतिदिन (मक्षु) शीघ्र (आधाः) अच्छे प्रकार धारण करते हो तो जिन को ये सब विद्या (जगम्यात्) वार-वार प्राप्त होवें (गोतमासः) अत्यन्त सब विद्याओं की स्तुति करनेवाले (ते) आप के लिये (एव) ही (सुवृक्ति) अच्छे प्रकार दोषों को अलग करनेवाले शुद्धि किये हुए (ब्रह्माणि) बड़े-बड़े सुख करनेवाले अन्नों को देने के लिये (अक्रन्) सम्पादन करते हैं, उनकी अच्छे प्रकार सेवा कीजिये ॥ १६ ॥

भावार्थ : परोपकारी विद्वानों को उचित है कि नित्य प्रयत्नपूर्वक अच्छी शिक्षा और विद्या के दान से सब मनुष्यों को अच्छी शिक्षा से युक्त विद्वान् करें। तथा इतर मनुष्यों को भी चाहिये कि पढ़ानेवाले विद्वानों को अपने निष्कपट मन, वाणी और कर्मों से प्रसन्न करके ठीक-ठीक पकाए हुए अन्न आदि पदार्थों से नित्य सेवा करें। क्योंकि पढ़ने और पढ़ाने से पृथक् दूसरा कोई उत्तम धर्म नहीं है, इसलिये सब मनुष्यों को परस्पर प्रीतिपूर्वक विद्या की वृद्धि करनी चाहिये ॥ १६ ॥ इस सूक्त में सभाध्यक्ष आदि का वर्णन और अग्निविद्या का प्रचार करना आदि कहा है, इससे इस सूक्तार्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ सङ्गति समझनी चाहिये ॥ इति श्रीयुतपरिव्राजकाचार्य्येण श्रीयुतमहाविदुषां विरजानन्दसरस्वतीस्वामिनां शिष्येण दयानन्दसरस्वतीस्वामिना विरचिते संस्कृतार्य्यभाषाभ्यां विभूषिते सुप्रमाणयुक्ते ऋग्वेदभाष्ये चतुर्थोऽध्यायः समाप्तिमगात् ॥