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Rigveda / 1 / 62 / 4

स सु॒ष्टुभा॒ स स्तु॒भा स॒प्त विप्रैः॑ स्व॒रेणाद्रिं॑ स्व॒र्यो॒३॒॑ नव॑ग्वैः। स॒र॒ण्युभिः॑ फलि॒गमि॑न्द्र शक्र व॒लं रवे॑ण दरयो॒ दश॑ग्वैः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 62 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : नोधा गौतमः | देवता : इन्द्र: | छन्द : विराडार्षीत्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर मनुष्यों को कैसे वर्त्तना चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

पदपाठ : सः। सु॒ऽस्तुभा॑। सः। स्तु॒भा। स॒प्त। विप्रैः॑। स्व॒रेण॑। अद्रि॑म्। स्व॒र्यः॑। नव॑ऽग्वैः। स॒र॒ण्युऽभिः॑। फ॒लि॒ऽगम्। इ॒न्द्र॒। श॒क्र॒। व॒लम्। रवे॑ण। द॒र॒यः॒। दश॑ऽग्वैः ॥

पदार्थ : हे (सः) वह (इन्द्र) परमैश्वर्ययुक्त (शक्र) शक्ति को प्राप्त करनेवाले सभाध्यक्ष ! जो आप (नवग्वैः) नवों से प्राप्त हुई गति वा (दशग्वैः) दश दिशाओं में जाने (सरण्युभिः) सब शास्त्रों में विज्ञान करनेवाली गतियों से युक्त (विप्रैः) बुद्धिमान् विद्वानों के साथ जैसे सूर्य्य (सुष्टुभा) उत्तम द्रव्य, गुण और क्रियाओं के स्थिर करने वा (स्तुभा) धारण करनेवाले (रवेण) शस्त्रों के शब्द से जैसे सूर्य (सप्त) सात संख्यावाले स्वरों के मध्य में वर्त्तमान (स्वरेण) उदात्तादि वा षड्जादि स्वर से (अद्रिम्) बलयुक्त (फलिगम्) मेघ का हनन करता है, वैसे शत्रुओं को (दरयः) विदारण करते हो (सः) आप हम लोगों से (स्वर्यः) स्तुति करने योग्य हो ॥ ४ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे बिजुली उत्तम-उत्तम गुणों से वर्त्तमान हुई जीवन के हेतु मेघ के उत्पन्न करने आदि कार्यों को सिद्ध करती है, वैसे ही सभाध्यक्ष आदि अत्यन्त उत्तम-उत्तम विद्या बल से युक्त पुरुषों के साथ वर्त्त के विद्यारूपी न्याय के प्रकाश से अन्याय वा दुष्टों का निवारण कर चक्रवर्त्ति राज्य का पालन करें ॥ ४ ॥