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Rigveda / 1 / 62 / 7

द्वि॒ता वि व॑व्रे स॒नजा॒ सनी॑ळे अ॒यास्यः॒ स्तव॑मानेभिर॒र्कैः। भगो॒ न मेने॑ पर॒मे व्यो॑म॒न्नधा॑रय॒द्रोद॑सी सु॒दंसाः॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 62 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : नोधा गौतमः | देवता : इन्द्र: | छन्द : भुरिगार्षीपङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर सभाध्यक्ष कैसा हो, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

पदपाठ : द्वि॒ता। वि। व॒व्रे॒। स॒ऽनजा॑। सनी॑ळे॒ इति॒ सऽनी॑ळे। अ॒यास्यः॑। स्तव॑मानेभिः। अ॒र्कैः। भगः॑। न। मेने॒ इति॑। प॒र॒मे। विऽओ॑मन्। अधा॑रयत्। रोद॑सी॒ इति॑। सु॒ऽदंसाः॑ ॥

पदार्थ : जैसे विद्वानों से जो (सनीडे) समीप (स्तवमानेभिः) स्तुतियुक्त (अर्कैः) स्तोत्रों से (सनजा) सनातन कारण से उत्पन्न हुई (द्विता) दो अर्थात् प्रजा और सभाध्यक्ष को (विवव्रे) विशेष करके स्वीकार किया जाता है, वैसे मनुष्य (अयास्यः) अनायास से सिद्ध करनेवाला (सुदंसाः) उत्तम कर्मयुक्त मैं जैसे (परमे) (व्योमन्) उत्तम अन्तरिक्ष में (रोदसी) प्रकाश और भूमि को (भगो न) सूर्य्य के समान विद्वान् (मेने) मानता और (अधारयत्) धारण करता है, वैसे इसको धारण करता और मानता हूँ ॥ ७ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि जैसे सभा आदि का अध्यक्ष ऐश्वर्य को और जैसे सूर्य प्रकाश तथा पृथिवी को धारण करता है, वैसे ही न्याय और विद्या को धारण करें ॥ ७ ॥