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Rigveda / 1 / 62 / 12

स॒नादे॒व तव॒ रायो॒ गभ॑स्तौ॒ न क्षीय॑न्ते॒ नोप॑ दस्यन्ति दस्म। द्यु॒माँ अ॑सि॒ क्रतु॑माँ इन्द्र॒ धीरः॒ शिक्षा॑ शचीव॒स्तव॑ नः॒ शची॑भिः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 62 | Mantra No : 12

In Hindi:

ऋषि : नोधा गौतमः | देवता : इन्द्र: | छन्द : आर्षीत्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अब अगले मन्त्र में सूर्य्य और सभापति आदि के गुणों का उपदेश किया है ॥

पदपाठ : स॒नात्। ए॒व। तव॑। रायः॑। गभ॑स्तौ। न। क्षीय॑न्ते। न। उप॑। द॒स्य॒न्ति॒। द॒स्म॒। द्यु॒मान्। अ॒सि॒। क्रतु॑ऽमान्। इ॒न्द्र॒। धीरः॑ शिक्ष॑। श॒ची॒ऽवः॒। तव॑। नः॒। शची॑भिः ॥

पदार्थ : हे (दस्म) शत्रुओं के नाश करनेवाले (शचीवः) उत्तम बुद्धि वा वाणी से युक्त (इन्द्र) उत्तम धनवाले सभाध्यक्ष ! जो आप (द्युमान्) विद्यादि श्रेष्ठ गुणों के प्रकाश से युक्त (क्रतुमान्) बुद्धि से विचार कर कर्म करनेवाले ! (धीरः) ध्यानी (असि) हैं, उस (तव) आपके (गभस्तौ) राजनीति के प्रकाश में (सनात्) सनातन से (रायः) धन (नैव) नहीं (क्षीयन्ते) क्षीण तथा (तव) आपके प्रबन्ध में (न) नहीं (उपदस्यन्ति) नष्ट होते हैं, सो आप अपनी (शचीभिः) बुद्धि, वाणी और कर्म से (नः) हम लोगों को (शिक्ष) उपदेश दीजिये ॥ १२ ॥

भावार्थ : मनुष्यो को चाहिये कि जो सनातन वेद के ज्ञान से शिक्षा को और सभापति आदि के अधिकार को प्राप्त होके प्रजा का पालन करे, उसी मनुष्य को धर्मात्मा जानें ॥ १२ ॥