Rigveda / 1 / 63 / 3
त्वं स॒त्य इ॑न्द्र धृ॒ष्णुरे॒तान्त्वमृ॑भु॒क्षा नर्य॒स्त्वं षाट्। त्वं शुष्णं॑ वृ॒जने॑ पृ॒क्ष आ॒णौ यूने॒ कुत्सा॑य द्यु॒मते॒ सचा॑हन् ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 63 | Mantra No : 3
In English:
Seer : nodhaa gautamaH | Devta : indra: | Metre : viraaTpa~Nkti | Tone : pa~nchamaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : tva.m satya indra dhRRiShNuretaantvamRRibhukShaa naryastva.m ShaaT. tva.m shuShNa.m vRRijane pRRikSha aaNau yuune kutsaaya dyumate sachaahan .
Component Words : tvam. satyaH. indra. dhRRiShNuH. etaan. tvam. RRIbhukShaaH. naryaH. tvam. ShaaT. tvam. shuShNam vRRijane. pRRikShe. aaNau. yuune. kutsaaya. dyumate. sachaa. ahan .
In Hindi:
ऋषि : नोधा गौतमः | देवता : इन्द्र: | छन्द : विराट्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः
विषय : फिर वह सभाध्यक्ष कैसा हो, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥
पदपाठ : त्वम्। स॒त्यः। इ॒न्द्र॒। धृ॒ष्णुः। ए॒तान्। त्वम्। ऋ॒भु॒क्षाः। नर्यः॑। त्वम्। षाट्। त्वम्। शुष्ण॑म् वृ॒जने॑। पृ॒क्षे। आ॒णौ। यूने॑। कुत्सा॑य। द्यु॒मते॑। सचा॑। अ॒ह॒न् ॥
पदार्थ : हे (इन्द्र) उत्तम सम्पदा के देनेवाले सभाध्यक्ष ! (त्वम्) आप जिस कारण (सत्यः) जीवस्वरूप से अनादि हो, जिस कारण (त्वम्) आप (धृष्णुः) दृढ़ हो तथा जिस कारण (त्वम्) आप (ऋभुक्षाः) गुणों से बड़े (नर्य्यः) मनुष्यों के बीच चतुर और (षाट्) सहनशील हो, इससे (वृजने) जिसमें शत्रुओं को प्राप्त होते हैं (पृक्षे) संयुक्त इकट्ठे होते हैं, जिसमें उस (आणौ) संग्राम में (सचा) शिष्टों के सम्बन्ध से (कुत्साय) शस्त्रों को धारण किये (द्युमते) उत्तम प्रकाशयुक्त (यूने) शरीर और आत्मा के बल को प्राप्त हुए मनुष्य के लिये (शुष्णम्) पूर्ण बल को देते हो। जिस कारण आप शत्रुओं को (अहन्) मारते तथा (एतान्) इन धर्मात्मा श्रेष्ठ पुरुषों का पालन करते हो, इससे पूजने योग्य हो ॥ ३ ॥
भावार्थ : सभा और सभापति के विना शत्रुओं का पराजय और राज्य का पालन किसी से नहीं हो सकता। इसलिये श्रेष्ठ गुणवालों की सभा और सभापति से इन सब कार्य्यों को सिद्ध कराना मनुष्यों का मुख्य काम है ॥ ३ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : नोधा गौतमः | देवता : इन्द्र: | छन्द : विराट्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः
विषय : पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते ॥
पदपाठ : त्वम्। स॒त्यः। इ॒न्द्र॒। धृ॒ष्णुः। ए॒तान्। त्वम्। ऋ॒भु॒क्षाः। नर्यः॑। त्वम्। षाट्। त्वम्। शुष्ण॑म् वृ॒जने॑। पृ॒क्षे। आ॒णौ। यूने॑। कुत्सा॑य। द्यु॒मते॑। सचा॑। अ॒ह॒न् ॥
पदार्थ : (त्वम्) निरूपितपूर्वः (सत्यः) सत्सु साधुर्जीवस्वरूपेणानादिस्वरूपो वा (इन्द्र) परमैश्वर्य्यप्रापक (धृष्णुः) दृढः (एतान्) मित्रान् शत्रून् वा (त्वम्) (ऋभुक्षाः) महान्। ऋभुक्षा इति महन्नामसु पठितम्। (निघं०३.३) (नर्य्यः) नृषु साधुर्नृभ्यो हितो वा (त्वम्) (षाट्) सहनशीलः। वा छन्दसि विधयो भवन्तीति केवलादपि ण्विः। (त्वम्) (शुष्णम्) बलम् (वृजने) वृजते शत्रून् येन तस्मिन् (पृक्षे) पृचन्ति संयुञ्जन्ति यस्मिन् (आणौ) संग्रामे (यूने) शरीरात्मनोः पूर्णं बलं प्राप्ताय (कुत्साय) कुत्सः प्रशस्तो वज्रः शस्त्रसमूहो वा यस्य तस्मै धृतवज्राय (द्युमते) द्यौः प्रशस्तो विद्याप्रकाशो विद्यते यस्मिँस्तस्मै (सचा) शिष्टसमवायेन सह (अहन्) शत्रून् हंसि ॥ ३ ॥
अन्वय : हे इन्द्र ! यतस्त्वं सत्योऽसि यतस्त्वं धृष्णुरसि यतस्त्वमृभुक्षा असि यतस्त्वं नर्य्योऽसि यतस्त्वं षाडसि तस्माद् वृजने पृक्ष आणौ सचा सत्समवायेन कुत्साय द्युमते यूने शूष्णं शरीरात्मबलं ददासि शत्रूनहन् हंस्येतान् धार्मिकान् पालयसि तस्मात् पूज्योऽसि ॥ ३ ॥
भावार्थ : नहि सभासभाद्यध्यक्षाभ्यां विना शत्रुपराजयो राज्यपालनं च यथावज्जायते तस्माच्छिष्टगुणयुक्ताभ्यामेताभ्यामेते कार्य्ये सर्वैर्मनुष्यैः कारयितव्ये इति ॥ ३ ॥