Rigveda / 1 / 64 / 3
युवा॑नो रु॒द्रा अ॒जरा॑ अभो॒ग्घनो॑ वव॒क्षुरध्रि॑गावः॒ पर्व॑ताइव। दृ॒ळ्हा चि॒द्विश्वा॒ भुव॑नानि॒ पार्थि॑वा॒ प्र च्या॑वयन्ति दि॒व्यानि॑ म॒ज्मना॑ ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 64 | Mantra No : 3
In English:
Seer : nodhaa gautamaH | Devta : indra: | Metre : nichRRijjagatii | Tone : niShaadaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : yuvaano rudraa ajaraa abhogghano vavakShuradhrigaavaH parvataaiva. dRRiLhaa chidvishvaa bhuvanaani paarthivaa pra chyaavayanti divyaani majmanaa .
Component Words : yuvaanaH. rudraaH. ajaraaH. abhok.ahanaH. vavakShuH. adhri.agaavaH. parvataaH.aiva. dRRiLhaa. chit. vishvaa. bhuvanaani. paarthivaa. pra. chyaavayanti. divyaani. majmanaa .
In Hindi:
ऋषि : नोधा गौतमः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः
विषय : फिर भी पूर्वोक्त वायु कैसे हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥
पदपाठ : युवा॑नः। रु॒द्राः। अ॒जराः॑। अ॒भो॒क्ऽहनः॑। व॒व॒क्षुः। अध्रि॑ऽगावः। पर्व॑ताःऽइव। दृ॒ळ्हा। चि॒त्। विश्वा॑। भुव॑नानि। पार्थि॑वा। प्र। च्या॒व॒य॒न्ति॒। दि॒व्यानि॑। म॒ज्मना॑ ॥
पदार्थ : हे मनुष्यो ! तुम लोग जो ये (पर्वताइव) पर्वत वा मेघ के समान धारण करनेवाले (युवानः) पदार्थों के मिलाने तथा पृथक् करने में बड़े बलवान् (अभोग्घनः) भोजन करने तथा मरने से पृथक् (अध्रिगावः) किरणों को नहीं धारण करनेवाले अर्थात् प्रकाशरहित (अजराः) जन्म लेके वृद्ध होना, फिर मरना इत्यादि कामों से रहित तथा कारणरूप से नित्य (रुद्राः) ज्वर आदि की पीडा से रुलानेवाले वायु जीवों को (ववक्षुः) रुष्ट करते हैं (मज्मना) बल से (पार्थिवा) भूगोल आदि (दिव्यानि) प्रकाश में रहनेवाले सूर्य आदि लोक (चित्) और (विश्वा) सब (भुवनानि) लोक (दृढा) दृढ़ स्थिरों को भी (प्रच्यावयन्ति) चलायमान करते हैं, उनको विद्या से यथावत् जानकर कार्य्यों के बीच लगाओ ॥ ३ ॥
भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को जैसे मेघ जलों के आधार और पर्वत ओषधि आदि के आधार हैं, वैसे ही ये संयोग-वियोग करनेवाले, सबके आधार, सुख-दुःख होने के हेतु, नित्यरूप, गुण से अलग, स्पर्श गुणवाले पवन हैं, ऐसा समझना योग्य है। और इन्हींके विना जल, अग्नि और भूगोल तथा इनके परमाणु भी जान-आने [तथा ठहरने] को समर्थ नहीं हो सकते ॥ ३ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : नोधा गौतमः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः
विषय : पुनस्ते कीदृशा इत्युपदिश्यते ॥
पदपाठ : युवा॑नः। रु॒द्राः। अ॒जराः॑। अ॒भो॒क्ऽहनः॑। व॒व॒क्षुः। अध्रि॑ऽगावः। पर्व॑ताःऽइव। दृ॒ळ्हा। चि॒त्। विश्वा॑। भुव॑नानि। पार्थि॑वा। प्र। च्या॒व॒य॒न्ति॒। दि॒व्यानि॑। म॒ज्मना॑ ॥
पदार्थ : (युवानः) मिश्रणामिश्रणकर्त्तृत्वेन बलिष्ठाः (रुद्राः) मरणज्वरादिपीडाहेतुत्वाद्रोदयितारः (अजराः) जन्मजरामृत्युधर्मादि-रहित्वात्कारणरूपेण नित्याः (अभोग्घनः) ये भोज्यन्ते ते भोजो हन्यन्ते ते हनः। भोजश्च ते हनो भोग्घनः न भोग्घनोऽभोग्घनस्ते (ववक्षुः) ये वक्षयन्ति रोषयन्ति ते (अध्रिगावः) अधृता गावो रश्मयो यैस्ते (पर्वताइव) यथा पर्वता मेघाः शैला वा धर्त्तारः सन्ति तथैव मूर्त्तद्रव्यधर्त्तारः (दृढा) दृढानि (चित्) अपि (विश्वा) सर्वाणि (भुवनानि) सर्वेषां पदार्थानामधिकरणानि (पार्थिवा) पृथिवीत्याख्यस्य कारणस्य विकारभूतानि भूगोलाख्यानि कार्य्याणि (प्र) प्रकृष्टार्थे (च्यावयन्ति) प्रचालयन्ति (दिव्यानि) दिवि प्रकाशे भवानि सूर्य्यविद्युदादीनि (मज्मना) शुद्धिधारणक्षेपणाख्येन बलेन। अत्र मस्जधातोरौणादिको मनिन् प्रत्ययो बाहुलकात्सकारलोपश्च। मज्मेति बलनामसु पठितम्। (निघं०२.९) ॥ ३ ॥
अन्वय : हे मनुष्याः ! यूयं य इमे पर्वताइव युवानोऽभोग्घनोऽध्रिगावोऽजरा रुद्रा जीवान् ववक्षु रोषयन्ति। मज्मना पार्थिवा दिव्यानि चिदपि विश्वा भुवनानि दृढा प्रच्यावयन्ति तान् विद्यया यथावद्विदित्वा कार्य्येषु संप्रयोजयत ॥ ३ ॥
भावार्थ : अत्रोपमालङ्कारः। मनुष्यैर्यथा मेघा जलाधिकरणाः शैलाश्चौषध्याद्यधिकरणाः सन्ति तथैवैते संयोगवियोगकर्त्तारः सर्वाधाराः सुखदुःखहेतवो नित्या रूपरहिताः स्पर्शवन्तो वायवः सन्तीति वेदितव्यम्। नह्येतैर्विना भूगोलजलाग्निपुञ्जाश्चैतेषां कणाश्च गन्तुमागन्तुं स्थातुं च शक्नुवन्ति ॥ ३ ॥