Rigveda / 1 / 64 / 10
वि॒श्ववे॑दसो र॒यिभिः॒ समो॑कसः॒ संमि॑श्लास॒स्तवि॑षीभिर्विर॒प्शिनः॑। अस्ता॑र॒ इषुं॑ दधिरे॒ गभ॑स्त्योरन॒न्तशु॑ष्मा॒ वृष॑खादयो॒ नरः॑ ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 64 | Mantra No : 10
In English:
Seer : nodhaa gautamaH | Devta : indra: | Metre : nichRRijjagatii | Tone : niShaadaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : vishvavedaso rayibhiH samokasaH sa.mmishlaasastaviShiibhirvirapshinaH. astaara iShu.m dadhire gabhastyoranantashuShmaa vRRiShakhaadayo naraH .
Component Words : vishva.avedasaH. rayi.abhiH. sam.aokasaH. sam.amishlaasaH. taviShiibhiH. vi.arapshinaH. astaaraH. iShum. dadhire. gabhastyoH. ananta.ashuShmaaH. vRRiSha.akhaadayaH. naraH .
In Hindi:
ऋषि : नोधा गौतमः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः
विषय : फिर उक्त पवन किस प्रकार के गुणवाले हैं, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥
पदपाठ : वि॒श्वऽवे॑दसः। र॒यिऽभिः॑। सम्ऽओ॑कसः। सम्ऽमि॑श्लासः। तवि॑षीभिः। वि॒ऽर॒प्शिनः॑। अस्ता॑रः। इषु॑म्। द॒धि॒रे॒। गभ॑स्त्योः। अ॒न॒न्तऽशु॑ष्माः। वृष॑ऽखादयः। नरः॑ ॥
पदार्थ : हे (नरः) विद्या को प्राप्त होनेवाले मनुष्यो ! तुम लोग जो (समोकसः) जिनसे अच्छे प्रकार निवास होता है (संमिश्लासः) अग्नि आदि चार तत्त्वों के साथ अत्यन्त मिले हुए (इषुम्) बाण वा इच्छा विशेष छोड़ते हुए (वृषखादयः) रसों को वर्षानेवाले पदार्थों के खानेवाले (अनन्तशुष्माः) अनन्त बलवान् (विरप्सिनः) बड़े (विश्ववेदसः) सब पदार्थों की प्राप्ति के हेतु होके सब पदार्थों को इधर-उधर चलानेवाले वायु (रयिभिः) चक्रवर्त्तिराज्य की शोभा आदि तथा (तविषीभिः) बल पराक्रम सेना आदि प्रजा और (गभस्त्योः) किरणयुक्त सूर्य्य वा प्रसिद्ध अग्नि के समान भुजाओं में बल को (दधिरे) धारण करते हैं, उनके गुणों को ठीक-ठीक जान कर उनसे विद्या, शिक्षा और यान के चलाने की क्रियाओं को ग्रहण करो ॥ १० ॥
भावार्थ : मनुष्य लोग विद्वान् तथा वायु आदि पदार्थविद्या के विना परलोक और इस लोक के सुखों की सिद्धि कभी नहीं कर सकते ॥ १० ॥
In Sanskrit:
ऋषि : नोधा गौतमः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः
विषय : पुनस्ते कीदृशा इत्युपदिश्यते ॥
पदपाठ : वि॒श्वऽवे॑दसः। र॒यिऽभिः॑। सम्ऽओ॑कसः। सम्ऽमि॑श्लासः। तवि॑षीभिः। वि॒ऽर॒प्शिनः॑। अस्ता॑रः। इषु॑म्। द॒धि॒रे॒। गभ॑स्त्योः। अ॒न॒न्तऽशु॑ष्माः। वृष॑ऽखादयः। नरः॑ ॥
पदार्थ : (विश्ववेदसः) विश्वानि सर्वाणि वस्तूनि विदन्ति येभ्यस्ते (रयिभिः) चक्रवर्त्तिराज्यश्रियादिभिः (समोकसः) सम्यगोको निवासार्थं स्थानं येभ्यस्ते (संमिश्लासः) अग्न्यादितत्त्वैः सम्यङ् मिश्राः। अत्र कपिलकादीनां सञ्ज्ञाछन्दसोर्वा रो लमापद्यत इति वक्तव्यम्। (अष्टा०वा०८.२.१८) इति लत्वम्। (तविषीभिः) बलपराक्रमयुक्ताभिः सेनाभिः (विरप्शिनः) महान्तः। विरप्शीति महन्नामसु पठितम्। (निघं०३.३) (अस्तारः) प्रक्षेप्तारः। अत्रास् धातोस्तृन् वाच्छन्दसि सर्वे विधयो भवन्तीतीडागमविकल्पः। (इषुम्) बाणम्। प्राप्तिसाधनमिच्छाविशेषं वा (दधिरे) धरन्ति (गभस्त्योः) रश्मियुक्तयोः सूर्य्यप्रसिद्धाग्न्योरिव भुजयोः (अनन्तशुष्माः) अनन्तं शुष्मं बलं येषान्ते (वृषखादयः) ये वृषान् रसवर्षकान् पदार्थान् खादयन्ति ते (नरः) नयनकर्त्तारो मनुष्या वायवो वा ॥ १० ॥
अन्वय : हे नरो मनुष्या ! यूयं ये समोकसः संमिश्लास इषुमस्तारो वृषखादयोऽनन्तशुष्मा विरप्सिनो विश्ववेदसो रयिभिस्तविषीभिश्च प्रजा गभस्त्योः सूर्य्याग्न्योरिव बलं दधिरे धरन्ति तेषां सङ्गेन विद्याशिक्षायानचालनक्रियाश्च स्वीकुरुत ॥ १० ॥
भावार्थ : मनुष्यैर्नहि विद्वद्भिर्वाय्वादिपदार्थविद्यया च विना परमार्थव्यवहारसुखानि सेद्धुं शक्यन्ते ॥ १० ॥