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Rigveda / 1 / 65 / 8

यद्वात॑जूतो॒ वना॒ व्यस्था॑द॒ग्निर्ह॑ दाति॒ रोमा॑ पृथि॒व्याः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 65 | Mantra No : 8

In Hindi:

ऋषि : पराशरः शाक्तः | देवता : अग्निः | छन्द : द्विपदा विराट् | स्वर : पञ्चमः

विषय : अब भौतिक अग्नि कैसा है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ॥

पदपाठ : यत्। वात॑ऽजूतः। वना॑। वि। अस्था॑त्। अ॒ग्निः। ह॒। दा॒ति॒। रोम॑। पृ॒थि॒व्याः ॥

पदार्थ : (यत्) जो (वातजूतः) वायु से वेग को प्राप्त हुआ (अग्निः) अग्नि (वना) वनों का (दाति) छेदन करता तथा (पृथिव्याः) पृथिवी के (ह) निश्चय करके (रोमा) रोमों के समान छेदन करता है, वह (सिन्धूनाम्) समुद्र और नदियों के (जामिः) सुख प्राप्त करानेवाला बन्धु (स्वस्राम्) बहिनों के (भ्रातेव) भाई के समान तथा (इभ्यान्) हाथियों की रक्षा करनेवाले पीलवानों को (राजेव) राजा के समान (व्यस्थात्) स्थित होता और (वनानि) वनों को (व्यत्ति) अनेक प्रकार भक्षण करता है ॥ ४ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में दो उपमालङ्कार हैं। जब मनुष्य लोग यानचालन आदि कार्यों में वायु से संयुक्त किये हुए अग्नि को चलाते हैं, तब वह बहुत कार्यों को सिद्ध करता है, ऐसा सब मनुष्यों को जानना चाहिये ॥ ४ ॥