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Rigveda / 1 / 67 / 2

क्षेमो॒ न सा॒धुः क्रतु॒र्न भ॒द्रो भुव॑त्स्वा॒धीर्होता॑ हव्य॒वाट् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 67 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : पराशरः शाक्तः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृत्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : अब सड़सठवें सूक्त का आरम्भ है। इसके प्रथम मन्त्र में विद्वान् कैसा हो, इस विषय को कहा है ॥

पदपाठ : क्षेमः॑। न। सा॒धुः। क्रतुः॑। न। भ॒द्रः। भुव॑त्। सु॒ऽआ॒धीः। होता॑। ह॒व्य॒ऽवाट् ॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! तुम लोग जो विद्वान् (वनेषु) सम्यक् सेवने योग्य पदार्थ (जायुः) जीतने के हेतु सूर्य्य के समान (अजुर्य्यम्) युद्धविद्या से सङ्गत सेना के तुल्य योग्य (श्रुष्टिम्) शीघ्रता करनेवाले को (राजेव) राजा के समान (क्षेमः) रक्षक (साधुः) सत्पुरुष के समान (भद्रः) कल्याणकारी (क्रतुर्न) उत्तम बुद्धि और कर्मकर्त्ता के तुल्य (स्वाधीः) अच्छे प्रकार धारण करने (होता) देने तथा अनुग्रह करने और (हव्यवाट्) लेने-देने योग्य पदार्थों का प्राप्त करानेवाला (भुवत्) हो तथा धर्मात्मा मनुष्यों को (वृणीते) स्वीकार करे, उसका सदा सेवन करो ॥ १ ॥

भावार्थ : इस मन्त्रा में उपमा और (वाचकलुप्तोपमालङ्कार) हैं। मनुष्यों को उचित कि विद्वानों का संग करके सदैव आनन्द भोग करें ॥ १ ॥