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Rigveda / 1 / 68 / 7

होता॒ निष॑त्तो॒ मनो॒रप॑त्ये॒ स चि॒न्न्वा॑सां॒ पती॑ रयी॒णाम् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 68 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : पराशरः शाक्तः | देवता : अग्निः | छन्द : द्विपदा विराट् | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर अध्यापक और शिष्य कैसे हों, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥

पदपाठ : होता॑। निऽस॑त्तः। मनोः॑। अप॑त्ये। सः। चि॒त्। नु। आ॒सा॒म्। पतिः॑। र॒यी॒णाम् ॥

पदार्थ : जो (निषत्तः) सर्वत्र स्थित (मनोः) मनुष्य के (अपत्ये) सन्तान में (रयीणाम्) राज्यश्री आदि धनों का (होता) देनेवाला है (सः) वह ईश्वर विद्युत् अग्नि (आसाम्) इन प्रजाओं का (पतिः) पालन करनेवाला है। हे (अमूराः) मूढ़पन आदि गुणों से रहित ज्ञानवाले ! (स्वैः) अपने (दक्षैः) शिक्षा सहित चतुराई आदि गुणों के साथ (तनूषु) शरीरों में वर्त्तमान होते हुए (मिथः) परस्पर (रेतः) विद्या शिक्षारूपी वीर्य का विस्तार करते हुए तुम लोग इस की (समिच्छन्त) अच्छे प्रकार शिक्षा करो (चित्) और तुम सब विद्याओं को (नु) शीघ्र (जानत) अच्छे प्रकार जानो ॥ ४ ॥

भावार्थ : मनुष्यों को उचित है कि परस्पर मित्र हो और समग्र विद्याओं को शीघ्र जानकर निरन्तर आनन्द भोगें ॥ ४ ॥