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Rigveda / 1 / 71 / 3

दध॑न्नृ॒तं ध॒नय॑न्नस्य धी॒तिमादिद॒र्यो दि॑धि॒ष्वो॒३॒॑ विभृ॑त्राः। अतृ॑ष्यन्तीर॒पसो॑ य॒न्त्यच्छा॑ दे॒वाञ्जन्म॒ प्रय॑सा व॒र्धय॑न्तीः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 71 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : पराशरः शाक्तः | देवता : अग्निः | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : जैसे ब्रह्मचर्याश्रम का सेवन करके पुरुष विद्वान् होते हैं, वैसे स्त्रियों को भी होना योग्य है, यह विषय कहा है ॥

पदपाठ : दध॑न्। ऋ॒तम्। ध॒नय॑न्। अ॒स्य॒। धी॒तिम्। आत्। इत्। अ॒र्यः। दि॒धि॒ष्वः॑। विऽभृ॑त्राः। अतृ॑ष्यन्तीः। अ॒पसः॑। य॒न्ति। अच्छ॑। दे॒वान्। जन्म॑। प्रय॑सा। व॒र्धय॑न्तीः ॥

पदार्थ : जो (विभृत्राः) विशेष धारण करनेवाली (दिधिष्वः) भूषण आदि से युक्त (अतृष्यन्तीः) तृष्णा आदि दोषों से पृथक् (वर्धयन्तीः) उन्नति करनेवाली कुमारी कन्या (देवान्) दिव्य गुणों को प्राप्त होकर (अर्य्यः) वैश्य के (इत्) समान (ऋतम्) सत्य विज्ञान को (धनयन्) विद्याधनयुक्त कर (आत्) इसके अनन्तर (अस्य) ब्रह्मचर्य की (धीतिम्) धारणा को (दधन्) धारण कर (प्रयसा) अन्न के समान वर्त्तमान (अपसः) कर्म्म (देवान्) विद्वान् (जन्म) और विद्या की प्राप्ति को (अच्छ) अच्छे प्रकार (यन्ति) प्राप्त होती हैं, वेदादि शास्त्रों में विद्वान् होकर सब सुखों को प्राप्त होती हैं ॥ ३ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे वैश्य लोग धर्म्म के अनुकूल धन का संचय करते हैं, वैसे ही कन्या विवाह से पहले ब्रह्मचर्यपूर्वक पूर्ण विद्वान् पढ़ानेवाली स्त्रियों को प्राप्त हो पूर्णशिक्षा और विद्या का ग्रहण तथा विवाह करके प्रजासुख को सम्पादन करे। विवाह के पीछे विद्याध्ययन का समय नहीं समझना चाहिये। किसी पुरुष वा स्त्री को विद्या के पढ़ने का अधिकार नहीं है, ऐसा किसी को नहीं समझना चाहिये, किन्तु सर्वथा सबको पढ़ने का अधिकार है ॥ ३ ॥